इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की शहादत के बाद से मोहर्रम केवल एक महीने का नाम नहीं रह गया बल्कि यह एक दुखद घटना का नाम है, एक सिद्धांत का नाम है औ...
पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.अ.व.) का काल भी एसा ही काल था परन्तु इस समय संवेदनशीलता बढ़ गई थी क्योंकि यदि हज़रत मुहम्मद के पश्चात उनके लाए हुए धर्म में, जो वास्तव में अबतक के सभी पैग़म्बरों का धर्म था फेर बदल हो जाता, उसके सिद्धांतों को मिटा दिया जाता तो फिर संसार में केवल अन्याय और अत्याचार का ही बोलबाला हो जाता। ग़लत और सही, तथा अच्छे और बुरे की पहचान मिट जाती। इसलिए पैग़म्बरे इस्लाम के स्वर्गवास के पश्चात उनके परिवार ने आगे बढ़कर उनकी शिक्षाओं को शत्रुओं से बचाने का प्रयास आरंभ कर दिया।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, अली और फ़ातेमा की गोदी में पले थे। पैग़म्बरे इस्लाम का लहू उनकी रगो में दौड़ रहा था। उनके ज्ञान, चरित्र और पारिवारिक महानता के कारण जनता उनसे अत्याधिक प्रेम करती थी। उनके विरोधी पक्ष में शैतान का प्रतिनिधि यज़ीद था। यज़ीद के पिता मोआविया ने इमाम हुसैन के बड़े भाई इमाम हसन के साथ जो एतिहासिक संधि की थी उसके अनुसार मुआविया को यह अधिकार प्राप्त नहीं था कि वह अपने उत्तराधिकारी का चयन करता। परन्तु मुआविया ने अपने जीवन के अन्तिम दिनों में पैग़म्बरे इस्लाम के नवासे इमाम हसन के साथ हुई संधि को अनदेखा करते हुए यज़ीद को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया। यज़ीद ने ख़लीफ़ा बनते ही अन्याय पर आधारित और मानवता एवं धर्म विरोधी अपने कार्य आरंभ कर दिये। उसने शाम अर्थात सीरिया की राजधानी से मदीने में अपने राज्यपाल को तुरंत यह आदेश भेजा कि वह पैग़म्बरे इस्लाम के नवासे इमाम हुसैन से कहे कि वे मेरी बैअत करें वरना उनका सिर काट कर मेरे पास भेज दो। बैअत का अर्थ होता है आज्ञापालन या समर्थन का वचन देना। इमाम हुसैन ने यह बात सुनते ही स्थिति का आंकलन कर लिया। वे पूर्णतयः समझ गए थे कि यज़ीद अपने दुष्कर्मों पर उनके द्वारा पवित्रता की मुहर और छाप लगाना चाहता है तथा एसा न होने की स्थिति में किसी भी स्थान पर उनकी हत्या कराने से नहीं चूकेगा। अतः इमाम हुसैन ने निर्णय लिया था कि जब मृत्यु को ही गले लगाना है तो फिर अत्याचार और अन्याय के प्रतीक से ऐसी टक्कर ली जाए कि वर्तमान विश्व ही नहीं आने वाले काल भी यह पाठ सीख लें कि महान आदर्शों की रक्षा कुर्बानियों के साथ कैसे की जाती है।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को यह भी ज्ञात था कि उनकी शहादत के पश्चात यज़ीदी दानव यह प्रयास करेंगे कि झूठे प्रचारों द्वारा उनकी शहादत के वास्तविक कारणों को छिपा दें। यही नहीं बल्कि शहादत की घटना को ही लोगों तक पहुंचने न दे अतः अली व फ़ातेमा के सुपूत ने समस्त परिवार को अपने साथ लिया। इस परिवार में इमाम हुसैन के भाई, चचेरे भाई, भतीजे, भान्जे, पुत्र, पुत्रियां, बहनें पत्नियां और भाइयों की पत्नियां ही नहीं बल्कि परिवार से प्रेम करने वाले दास और दासियां भी सम्मिलित थे।
यह कारवां ६० हिजरी क़मरी वर्ष के छठे महीने रजब की २८ तारीख़ को मदीने से मक्का की ओर चला था।
इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के भाई मुहम्मद बिन हनफ़िया ने ही नहीं बल्कि मदीना नगर के अनेक वरिष्ठ लोगों ने इमाम हुसैन को रोकने का प्रयास किया था परन्तु वे हरेक से यह कहते थे कि मेरा उद्देश्य, अम्रबिल मारुफ़ व नहि अनिल मुनकर है अर्थात मैं लोगों को भलाई का आदेश देने और बुराई से रोकने के उद्देश्य से जा रहा हूं। हुसैन जा रहे थे। पैग़म्बरे इस्लाम के परिजनों से नगर लगभग ख़ाली होने वाला था। वे जिन लोगों को घर में छोड़े जा रहे थे उनमें पैग़म्बरे इस्लाम की बूढ़ी पत्नी हज़रत उम्मे सलमा, इमाम हुसैन के प्रिय भाई अब्बास की माता उम्मुल बनीन और इमाम हुसैन की एक बीमार सुपुत्री हज़रत फ़ातिमा सुग़रा थीं।
मुहर्रम शुरू होने में अब केवल 1-२ दिन बचे हैं अज़दारों की आँखों में आंसू हैं इस्लामी नव वर्ष मुहर्रम है लेकिन कोई किसी को मुबारकबादी नहीं देता बल्कि नाम आँखों से माह ऐ मुहर्रम का इस्तेकबाल करते हैं और अपने अपने घरों में मजलिस इमाम हुसैन (अ.स) के दुःख , उनके परिवार वालों पे हुए ज़ुल्म को बनान कर के आंसू बहाते हैं | हर तरह इमाम हुसैन (अ.स) को अपना मेहमान बनाने के एहतेमाम हो रहे हैं |अज़खाने इमाम बड़ों को सजाया जा रहा है | अब यह अज़ादारी दो महीने आठ दिन तक इस्लाम पे चलने वाले करेंगे और इमाम हुसैन (अ.स) के किरदार से नसीहत लेते हुए ज़ुल्म के खिलाफ आवाज़ उठाते हुए ,भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ते हुए , इंसानियत का पैगाम दुनिया को देते हुए अपना पूरा साल गुज़ार देंगे अपने उस इमाम के इंतज़ार में जो इस दुनिया में फिर से उजाला लाएगा |
khiNchi hai teigh ke hai charkh par hilaal'e aza
sawaad'e shabb hai ke khaimoN se hai dhuwaaN utTha
sawaad'e shabb hai ke khaimoN se hai dhuwaaN utTha
na chaand deikhte hi kis tarah baheiN aaNsu
isi maheene meiN Ahmed ka ghar tabaah hua
isi maheene meiN Ahmed ka ghar tabaah hua
yeh chaand wo hai ke dasweeN ko jiski haaEy ghazab
sarey Hussain hua waqte asr tUn se juda
sarey Hussain hua waqte asr tUn se juda
yehi wo chaand hai jis meiN ke ahle Koofa ne
jalaaey khaime aur ahl'e Haram ko loot liya
jalaaey khaime aur ahl'e Haram ko loot liya
imame waqt jo thEy baad'e Sarwar'e zeeshaaN
isi maheene mein aadaa ne unko loot liya
isi maheene mein aadaa ne unko loot liya
hua tha jinke makaaN se riwaaj parde ka
isi maheene meiN cheeni saroN se unke rida
isi maheene meiN cheeni saroN se unke rida
thEy jamaa koochao baazaar meiN tamashaai
hujoom'e aam meiN ahle Haram ka sAr tha khula
hujoom'e aam meiN ahle Haram ka sAr tha khula
khuda ke waaste kuch zaalimoN taras khaao
hujoome aam kuja aal e Buturaab kuja
hujoome aam kuja aal e Buturaab kuja
Yazeed takht pa hai, zeire takht farq e Imam
sAr e Hussain kuja, majlise sharab kuja
sAr e Hussain kuja, majlise sharab kuja
hai ishtiyaaq e ziyarat se Hind meiN be_taab
bula lo Fikr* ko raoze pa apne aey Maula
bula lo Fikr* ko raoze pa apne aey Maula


