azadari jaunpur,muharram india

हुसैनी कारवान करबला की ओर आ रहा था कि मार्ग में एक परिवार से उसकी भेंट हुई। इस परिवार में मुख्यतः तीन व्यक्ति थे। एक बूढ़ी माता, एक युवा और एक नववधू। पिता की मृत्यु के पश्चात ईसाई घराने की इस माता ने बड़ी कठिनाइयों से अपने पुत्र का पालन-पोषण किया था। शिक्षा-दीक्षा के पश्चात अपने पुत्र को विवाह के बंधन में बांधा था ताकि उसका वंश आगे बढ़ सके और माता को जीवन भर के दुखों के पश्चात इस आयु में सुख के दिन देखना नसीब हों। यह छोटा सा कारवां जब हुसैनी कारवां के सामने पहुंचा तो वहबे कल्बी नामक युवक ने जाकर इमाम हुसैन और उनके साथियों से भेंट की और बस विदा लेने ही वाला था कि उसकी माता की दृष्टि उस कारवान के तेजस्वी चेहरे पर पड़ गई। उसने तुरंत बेटे को बुलाया और कहा कि मेरे और तेरे पिता के घराने वाले सभी अत्यन्त धार्मिक थे। वे सदैव सत्य की खोज में रहा करते थे। उन्होंने मुझसे कहा था कि किसी यात्रा में यदि तेरा सामना अत्यन्त तेजस्वी व्यक्तित्व वालों से हो तो उनके बारे में जानकारी प्राप्त करना और यदि वे ईश्वर के अन्तिम पैग़म्बर के घराने वाले हों तो फिर उनके साथ हो जाना क्योंकि वे सत्य पर होंगे। माता की यह बात सुनकर आज्ञाकारी बेटे ने इमाम हुसैन से पुनः भेंट की और विभिन्न प्रश्नों के पश्चात जब वह इस परिणाम तक पहुंच गया कि यह वही कारवान है जिसकी खोज उसके पूर्वजों और माता को थी तो वह अत्यधिक प्रसन्नता के साथ अपनी माता के पास आया और उसे सूचित किया। वहब की माता तुरंत अपनी सवारी से उतरी और इमाम हुसैन की बहन हज़रत ज़ैनब एवं अन्य महिलाओं की सेवा में उपस्थित हुई। उनके लक्ष्य, विश्वास और धर्म की ओर से पूर्णतयः संतुष्ट होने के पश्चात उनके साथ होने का निर्णय ले लिया।
आशूर का दिन निकलने से पूर्व ही यज़ीदी सेना की ओर से तीर आने लगे थे। दिन चढ़ते-चढ़ते इमाम हुसैन के कई साथी शहीद हो चुके थे। बलिदान की इस बेला में एक होड़ सी लगी हुई थी। प्रत्येक व्यक्ति की यह इच्छा थी कि वह किसी न किसी प्रकार अपना जीवन देकर इमाम हुसैन को बचा ले। एसे में वहब कल्बी की माता ने भी अपने पुत्र को ईश्वरीय सिद्धांतों की सुरक्षा के लिए रणक्षेत्र में जाने पर तैयार किया। वहब का स्वयं भी यही लक्ष्य था। एक बार माता ने वहबे कल्बी को बुलाया और कहा बेटा मुझे इस बात का भय है कि कहीं तेरी नववधु तुझे इस रात पर जाने से रोक न ले। अभी वहब कुछ कहने भी न पाए थे कि वधु आगे आई और बोली मैं अपने पति को इस महान लक्ष्य की प्राप्ति से नहीं रोकूंगी परन्तु मेरी एक शर्त है कि वहब मुझे वचन दें कि स्वर्ग सुन्दरियों के देखने के पश्चात वे मुझे भूलेंगे नहीं। यह सुनकर माता ने अपनी साहसी बहू को सीने से लगा लिया। कुछ समय बीता और वहबे कल्बी रणक्षेत्र में हुसैन का समर्थन करते हुए शहीद हो गए। यज़ीदी सेना ने माता की भावनाओं को उत्तेजित करने हेतु वहब का सिर माता की ओर फेंका, जिसे उस बूढ़ी महिला ने कांपते हांथों से उठाकर पहले छाती से लगाया, उसे चूमा और फिर शत्रु की ओर यह कहकर फेंका दिया कि हम जो वस्तु ईश्वर के मार्ग में भेंट स्वरूप देते हैं उसे वापस नहीं लेते।