बचपन से जब भी मुहर्रम में अपने वतन जौनपुर आता था तो नौ मुहर्रम को मीर घर पानदरीबा का जुलुस अवश्य करता था | वहाँ यह जुलुस शाम ४-5 बजे तक ...
बचपन से जब भी मुहर्रम में अपने वतन जौनपुर आता था तो नौ मुहर्रम को मीर घर पानदरीबा का जुलुस अवश्य करता था | वहाँ यह जुलुस शाम ४-5 बजे तक उठता है | पहले यह बहुत ही शानदार तरीके से हुआ करता था जिसमे अमारी, हाथी ,टेबल,अलम तुर्बत और ज़ुल्जिनाह हुआ करते थे | आज ही उसकी शक्ल वैसी ही है बस ज़रा सी कुछ कमी लगती है|
इस जुलूस की खुसूसियत यह थी की जिस दिन यह जुलुस होता था भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान नमाज़ ऐ जुहर के बाद से यहाँ नौहे को अपनी शहनाई से बजाते थे जिसमे इतना दर्द हुआ करता था की आँखों से आंसू ज़ारी हो जाते थे | आज भी जब नमाज़ ऐ जुहर नौ मुहर्रम को आती है तो मरहूम बिस्मिल्लाह खान अवश्य याद आते हैं |
बिस्मिल्लाह खान से मेरी मुलाक़ात बहुत सालो रही जब मैं बनारस में पढता था | सादगी भरी जिंदगी , ना शोहरत का गुरुर और ना अकड़ | आज भी उनको जौनपुर याद करता है |
आप भी सुनें वो शहनाई पे नौहा |
परदेस में बहन को चले किसपे छोड़ के
भैया हुसैन जाते हो क्यूँ मुह को मोड़ के |
इस जुलूस की खुसूसियत यह थी की जिस दिन यह जुलुस होता था भारत रत्न बिस्मिल्लाह खान नमाज़ ऐ जुहर के बाद से यहाँ नौहे को अपनी शहनाई से बजाते थे जिसमे इतना दर्द हुआ करता था की आँखों से आंसू ज़ारी हो जाते थे | आज भी जब नमाज़ ऐ जुहर नौ मुहर्रम को आती है तो मरहूम बिस्मिल्लाह खान अवश्य याद आते हैं |
बिस्मिल्लाह खान से मेरी मुलाक़ात बहुत सालो रही जब मैं बनारस में पढता था | सादगी भरी जिंदगी , ना शोहरत का गुरुर और ना अकड़ | आज भी उनको जौनपुर याद करता है |
आप भी सुनें वो शहनाई पे नौहा |
परदेस में बहन को चले किसपे छोड़ के
भैया हुसैन जाते हो क्यूँ मुह को मोड़ के |
Maara gaya hai teer se, bachcha Rabab ka
Bachcha bhi woh, jo paraey dil tha Rabab ka
Raahe Khuda meiN sadqe kiya apne Laal ko
Kaisa jigar tha, kaisa kaleija, Rabab ka
Kuffar ko dikha ke zabaN, maaNgta tha aab
Noor e nazar Hussain ka, bachcha Rabab ka
Kya iss sawal ka yehi, duniya meiN tha jawab
Teer e sitam se qatl ho, bachcha Rabab ka
Talwar se banaai lahed, khoad kar zameeN
YuuN khaak mein chupa diya,bachcha Rabab ka
A Documentary by NFDC
Director/Camera : Goutam Ghose



