कटघरा इलाका शहर के बीच में गोमती किनारे बसा हुआ है | यहाँ की अज़ादारी ख़ास तौर पे मुहर्रम की 6 और 9 को यहाँ मजलिस होती है और जुलुस बरामद ...
कटघरा इलाका शहर के बीच में गोमती किनारे बसा हुआ है | यहाँ की अज़ादारी ख़ास तौर
पे मुहर्रम की 6 और 9 को यहाँ मजलिस होती है और जुलुस बरामद होता है | यह जुलुस
नवाब गाजी के रौज़े से उठता है और हमाम दरवाज़े तक जाता है |6 रबीउल अव्वल की अमारी
भी यहाँ मशहूर है |इनमे से 6 मुहर्रम और २० सफ़र का जुलुस बहुत पुराना और मशहूर है
|
यहाँ का यह रौज़ा ऐतिहासिक रौज़ा है जिसमे हजरत मुहम्मद (स.अव), हजरत अब्बास अलमदार , बीबी सकीना के रौज़े बने हुए हैं| किनारे एक पुरानी मस्जिद भी दिखती है को इसके ऐतिहासिक होने का सुबूत देती है | यहाँ पे एक चौक बना हुआ है जिसमे अलम ताज़ा के फूल बहाए जाते हैं और यह पूल गोमती नदी में चला जाता है | ऐसा चौक कहा जाता है की दुनिया में केवल दो हैं एक इरान में और दूसरा कटघरा जौनपुर में |
यह रौज़ा १५२७ में हुमायूँ के ज़माने का बना है लेकिन बार बार यह बाढ़ में नष्ट हो जाता था बाद में १७७४ में खानखाना ने इसे मुकम्मल करवाया | मिर्ज़ा जियारत हुसैन साहब का मैं शुक्र गुज़ार हूँ की उन्होंने मुझे कटघरा की अज़ादारी और यहाँ के क़दीमी रोजों के बारे में बताया |
यहाँ का यह रौज़ा ऐतिहासिक रौज़ा है जिसमे हजरत मुहम्मद (स.अव), हजरत अब्बास अलमदार , बीबी सकीना के रौज़े बने हुए हैं| किनारे एक पुरानी मस्जिद भी दिखती है को इसके ऐतिहासिक होने का सुबूत देती है | यहाँ पे एक चौक बना हुआ है जिसमे अलम ताज़ा के फूल बहाए जाते हैं और यह पूल गोमती नदी में चला जाता है | ऐसा चौक कहा जाता है की दुनिया में केवल दो हैं एक इरान में और दूसरा कटघरा जौनपुर में |
यह रौज़ा १५२७ में हुमायूँ के ज़माने का बना है लेकिन बार बार यह बाढ़ में नष्ट हो जाता था बाद में १७७४ में खानखाना ने इसे मुकम्मल करवाया | मिर्ज़ा जियारत हुसैन साहब का मैं शुक्र गुज़ार हूँ की उन्होंने मुझे कटघरा की अज़ादारी और यहाँ के क़दीमी रोजों के बारे में बताया |


