सरायख्वाजा क्षेत्र के दक्खिनपट्टी बबरखां गांव में शनिवार की रात जश्ने बाबुल हवाएज के उनवान से एक तरहीं महफिल ए मकासेदा का आयोजन किया गया...
सरायख्वाजा क्षेत्र के दक्खिनपट्टी बबरखां गांव में शनिवार की रात जश्ने बाबुल हवाएज के उनवान से एक तरहीं महफिल ए मकासेदा का आयोजन किया गया। जिसमें देश के विभिन्न हिस्सों से आये हुए शायरों ने दिये गये दो मिसरों पर अपना कलाम पेश किया। रात भर चले इस कार्यक्रम में लोगों ने शायरों के एक से बढ़कर एक कलाम का लुत्फ उठाया। कार्यक्रम की शुरूआत तेलावते कलामे पाक से हुई। जिसके बाद फैजाबाद से आये उलेमा ने तकरीर की और महफिल का आगाज किया गया। महफिल में समाज बांधते हुए धामपुर से आये युवा शायर फैज धामपुरी ने अपना कलाम पेश किया। उनके इस शेर की खुब प्रशंसा की गयी।
इस वास्ते फ़ौज को सुनाया कलामे पाक
कह दे न कोई शख्स कि शब्बीर मर गये।
उनके बाद कानपुर से आये शायर कमाल वारसी ने अपने कलाम से खूब शमां बांधी। उनके भोजपुरी कलाम की भूरि-भूरि प्रशंसा हुई। तरह पर पढ़े गये कलाम में उनका यह शेर खूब सराहा गया।
शीर-ए-मादर की तहारत की करामत देखिये
मेरे हिस्से में अली मौला का मिम्बर आ गया।
अपना कलाम पेश करते हुए सागर बनारसी ने लोगों को वाह-वाह करने पर मजबूर कर दिया। उनका शेर
ऐ मौत आ कि अब तेरे आने का गम नहीं,
मेरे सराहने हजरते अब्बास आ गये।
चांद उरई के कलाम की भी खूब-खूब प्रशंसा हुई और लोगों ने जमकर वाह-वाही की। उनका शेर
हैबते जैगम से यूं पसपा हुई लाखों की फौज,
अर्श से जैसे अबाबिलों का लश्कर आ गया।
सलमान काविश के पूरे कलाम की खूब-खूब सराहना की गयी। गैर तरह में उनका यह शेर बहुत पसंद किया गया।
कर्बला में इसलिए सूरज सवां नैजे पर था
रौशनी लेनी थी उसको हजरते अब्बास से।
तरह में पढ़ा गया उनका शेर
जाता है प्यासा कुएं के प्यास सुनते थे
मगर उठ के एक प्यासे के चुल्लू में समुंदर आ गया।
शायर शहर अर्शी के शेर की भी खूब सराहना की गयी। उनका शेर हर
एक साथी का किरदार आइना था
मगर परख रहे है शहे कर्बला बुझाके चिराग।
बादशाह राही ने जब ये शेर पढ़ा तो लोग झूम उठे। उनका शेर
एक दो तीन होना बुरी बात है बीज नफरत के बोना बुरी बात है।
खुर्शीद मुजफ्फरनगरी ने एक से बढ़कर एक कई कलाम सुनाये कभी गालिब की जमीन पर गजल के मिसरों को मदह में जोड़कर तो कभी दिये गये मिसरे पर। उनका शेर
जुल्म के रूख पे खौफ तारी है कट गया सर बयान जारी है,
सब्र से जुल्म का तकाबुल क्या, एक शहंशाह एक भिखारी है।
महफिल में शोएब नौगानवी, जफर आलमी, शहंशाह मिर्जापुरी, हैदर मौलायी बनारसी, सलीम बनारसी, आफताब मिर्जापुरी, अहमद रजा जलाली ने भी कलाम पेश किया। कार्यक्रम के अंत में बुजुर्ग शायर कम्बर जौनपुरी ने अपने मिसरे पर कलाम सुनाया। कार्यक्रम का संचालन डा. नैय्यर जलालपुरी ने किया। इस मौके पर बतौर मुख्य अतिथि मोहम्मद हसन पीजी कालेज के प्राचार्य डा. अब्दुल कादिर खां एवं डा. कमर अब्बास समेत तमाम लोग मौजूद रहे। अंत में सामिन रजा खां ने सभी का धन्यवाद ज्ञापित किया।



