मुहर्रमआते ही जगह जगह अज़ादारी के जुलुस इमाम हुसैन (अ.स ) और कर्बला के शहीदों की शहादत को याद करते हुए ...
मुहर्रमआते ही जगह जगह अज़ादारी के जुलुस इमाम हुसैन (अ.स ) और कर्बला के शहीदों की शहादत को याद करते हुए निकलने लगते हैं | इन जुलूसों में कर्बला में हुयी शहादत को याद करने के लिए प्रतीकात्मक तौर पे अलम, ताजिया, तुर्बत, ज़ुल्जिनाह इत्यादि को शामिल किया जाता है जिसमे ज़ुल्जिनाह इमाम हुसैन (अ.स) की सवारी को कहते हैं और किसी घोड़े को सजा के उसे जुलुस में शामिल किया जाता है जिस से लोग इमाम हुसैन (अ.स) की जंग और शहादत को याद कर सकें |
इसके खरीद के वक़्त का एक वाक्या बहुत मशहूर है की जब हजरत मुहम्मद (स.अ.व) ज़ुल्जिनाह को उसके मालिक हारीस की मांगी गयी रक़म को अदा करके खरीद चुके और जाने लगे तो अचानक हारिस ने उनसे फिर से तय रक़म माँगा और कहा आपने मुझे आपने कुछ नहीं दिया | इस खरीद फरोख्त के वक़्त कोई गवाह भी नहीं था इसलिए मसला पेचीदा हो गया |
हजरत मुहम्मद (स.अ.व) ने जब ये सुना तो कहा ऐ हमजा आज से तुम्हारी गवाही दो शख्स की गवाही मानी जायगी |
ये ज़ुल्जिनाह हजरत मुहम्मद (स.अ.व) की सवारी थी जो कर्बला की जंग में इमाम हुसैन (अ.स ) की सवारी बनी और इमाम हुसैन (अ.स ) की शहादत के बाद अपने सर में खून लगा के इमाम हुसैन (अ.स ) के खेमे में शहादत की खबर देने गया |
उसके बाद जब लश्कर ऐ यजीद ने उसे पकड़ने की कोशिश की तो वो दरया फुरात की तरफ भाग गया और उसके बाद किसी ने उसे नहीं देखा |
आज ज़्यादातर जुलूसों में इस ज़ुल्जिनाह को सजाया जाता है एक चादर को रंग के जिस से लगता है की चादर में खून लगा है और उसमे इमाम हुसैन (अ.स ) की ढाल , और अमामा रखा रहता है जिसपे तीर लगे होते हैं | ये सभी प्रतीकात्मक है और सिर्फ इमाम हुसैन (अ.स ) की जंग और शहादत को याद करने का एक तरीका है |इस्लाम में अगर आप जानवर भी वफादारी करे और आपकी मदद करे तो उसका भी ज़िक्र करना सवाब माना जाता है | अक्सर लोग ये इलज़ाम लगा देते हैं की अज़ादारी के नाम पे शिया मुसलमान घोड़े को पूजते हैं जो की सरासर एक जहालत भरा इलजाम है |खान ऐ काबा के चक्कर लगा के हज करने वाला मुसलमान जानता है ये जो अल्लाह का घर कहा जा रहा है केवल एक प्रतीकात्मक मक़ाम है खुदा नहीं |
कहा जाता है की सय्यिद अहसान अख्विंद मीर जो ईरान के शाह तह्मस्प की फ़ौज में थे हुमायूँ के साथ हिन्दुस्तान आये और जौनपुर में आकर बस गए | उन्होंने बहुत से इमाम बाड़े बनवाये जो आज भी मौजूद हैं और उन्होंने ही इस अज़ादारी में " ज़ुल्जिनाह "निकालने का तरीका शामिल किया जो ईरान में पहले से ही मौजूद था | राजा इदरत जहां जो सय्यिद अहसन अख्विंद मीर की नस्ल से हैं उन्होंने भी मस्जिदों और इमाम बाड़ों की तामील करवायी | REF: ibid PG 50-53




