इतिहास गवाह है की हक़ पे रहने वाले के साथी कम हुआ करते हैं और अगर होते भी हैं तो बातिल के लालच देने या खौफ से हक़ पे चलने वालों का साथ छो...
इतिहास गवाह है की हक़ पे रहने वाले के साथी कम हुआ करते हैं और अगर होते भी हैं तो बातिल के लालच देने या खौफ से हक़ पे चलने वालों का साथ छोड़ देते हैं और अगर बहुत खौफ ए खुदा हुआ तो ना हक़ का साथ देते हैं और ना बातिल का । नतीजे के हक़ पामाल हो जाता है और अगर फिर भी हक़ को बचाना हो तो हुसैन (अ.स) की तरह शहादत देती पड़ती है जिसके ज़िम्मेदार वो होते हैं जिन्होंने लालच में या खौफ से हक़ का साथ छोड़ दिया या चुप बैठ गए ।
ज़हूर ए इमाम ए ज़माना चाहते हो तो हक़ का साथ दो और ऐसा लश्कर बनाओ जो ना लालच से टूटे ,ना खौफ से टूटे और हक़ का साथ देता रहे फिर देखो कैसे बातिल भागता है और इमाम ए ज़माना का ज़हूर होता है ।
यही पैग़ाम ए कर्बला है । … एस एम मासूम