जनाब मुस्लिम बिन औसजा, मदीने से चला काफिला

कूफा में जब जनाब ऐ मुस्लिम छुपे हुए थे तो एक इब्ने ज़ियाद का सिपाही आया जिसने खुद को शिआ ने अली बताया और मुस्लिम से मिलने की ख्वाहिश ज़ाहिर की । जनाब मुस्लिम बिन औसजा उसके फरेब को ना समझ सके और उसे जनाब ऐ मुस्लिम से मिलवा दिया जिसके लिए वो खुद को कभी माफ़ नहीं कर सके ।
जब मुस्लिम और हानी शहीद हो गए तो जनाब मुस्लिम बिन औसजा कूफ़े के बाहर पैदल ही छुपते हुए निकल पड़े और लोगों के अनुसार इमाम हुसैन से उनकी मक्के से कूफा जाने वाली राह में मुलाक़ात हुयी ।
जनाब मुस्लिम बिन औसजा ने इमाम से ख्वाहिश ज़ाहिर की उनके चलने और जिहाद करने की लेकिन इमाम ने कहा की ८० साल की उम्र पे उनपे जिहाद वाजिब नहीं है इसलिए जाओ अपने घर जाओ । लेकिन जनाब मुस्लिम बिन औसजा नहीं माने और इमाम की इजाज़त मिल गयी ।
सुबह जब जंग शुरू हुयी और हर शहीद हो चुके तो जनाब मुस्लिम बिन औसजा ने इमाम से जाने की इजाज़त मांगी और उसके बाद वो हबीब इब्ने मज़ाहिर के पास गए और कहा ऐ हबीब मेरी पगड़ी खोल के मेरी कमर में बाँध दो जिससे मेरी कमर सीधी हो सके और मैं जंग में जा के दुशमन को ख़त्म कर सकूँ ।
हबीब ने कहाँ तुम्हारे बाल सफ़ेद हैं यह खुले रहेंगे तो जनाब मुस्लिम बिन औसजा ने कहा इन्ही सफ़ेद बालों को दिखाऊंगा हज़रत मुहम्मद स अ व को और यज़ीद के ज़ुल्म का इन्साफ मांगूंगा । जनाब मुस्लिम बिन औसजा जब मैदान में आये तो एक सिपाही ने उनपे तंज़ किया की जाओ बिस्तर में लेटो लेकिन मुस्लिम बिन औसजा ने उसका जवाब नहीं दिया और हमले को रोकते हुए उसे शहीद किया ।
उम्र बिन साद ने २० सिपाहियों का लश्कर भेजा जिसमे से ६ जनाब मुस्लिम बिन औसजा के हाथों मारे गए और बाक़ी भाग गए । प्यासे जनाब मुस्लिम बिन औसजा थक के एक जगह रुके घोड़े से उतरे ,जिस्म ज़ख्मो से चूर था की अचानक गिर पड़े । इमाम हुसैन और हबीब इब्ने मज़ाहिर दौड़े और जब पहुंचे तो जनाब मुस्लिम बिन औसजा के चेहरे पे मुस्कराहट थी और लबो पे अल्लाह का शुक्र । इमाम हुसैन की गोद में जनाब मुस्लिम बिन औसजा शहीद हुए ।


