28 व 29 रजब को मजलिस जुलूसों का आयोजन
जौनपुर। अंजुमन जाफरी के तत्वावधान में शौकत खां मुन्ना अकेला मुतवल्ली मरकजी कल्लू इमामबाड़ा की देख-रेख में हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी अंगारे का मातम एवं जुलूस का आयोजन किया गया जहां शोज़खानी गौहर जैदी ने किया। साथ ही शायरों ने अपने कलाम पेश किये। मजलिस को खेताब फरमाते हुये इमामे जुमा मौलाना महफूजुल हसन खां ने बताया कि पैगम्बरे इस्लाम हजरत मोहम्मद स.अ.व.के नवासे हजरत इमाम हुसैन अ.स. ने अरबी माह की 28 रजब को मदीने से अपनी यात्रा अर्थात् सफर प्रारम्भ किया था। इसे सफरे इमाम हुसैन के नाम से याद
किया जाता है और गम मनाया जाता है। दुनिया भर के मुसलमान विशेषकर शिया 28 व 29 रजब को मजलिस जुलूसों का आयोजन करके हजरत इमाम हुसैन एवं उनके साथियों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। हजरत इमाम हुसैन की कुर्बानी ने कयामत तक अर्थात् अनन्त काल तक के लिये मानव समाज के सिर को ऊंचा कर दिया है। मानवीय मूल्यों का महत्व कर्बला की मार्मिक घटना से प्राप्त होता है। इस्लाम का मूल उद्देश्य इंसानी समाज को स्वाभिमान के साथ जीवन जीने का है। इमाम हुसैन ने इंसानों को स्वाभिमान से जीने का सलीका बताया है। उनका यह कथन आज भी मानव समाज के मस्तक को ऊंचा करता है- जिल्लत की जिन्दगी से इज्जत की मौत बेहतर है’। मौलाना ने इमाम हुसैन के मदीने से शुरू हुये सफर मक्का के प्रवास एवं कर्बला तक के सफर का वृतान्त विस्तार से बताया। अन्त में इमाम हुसैन की शहादत का जिक्र किया जिसको सुनकर उपस्थित जनसमूह की आंखें नम हो गयीं। बाद खत्म मजलिस ताबूत इमाम हुसैन, अलम, झूला बरामद हुआ एवं उपस्थित जनसमूह ने दहकते हुये अंगारे के ऊपर मातम करते हुये ‘या हुसैन-या हुसैन’ की सदा बुलन्द की। अंगारे के मातम के दौरान नसीम हसन बारादुअरिया की तकरीर हुई व अंजुमन जाफरी के दस्ते ने नौहाखानी व सीनाजनी की।

किया जाता है और गम मनाया जाता है। दुनिया भर के मुसलमान विशेषकर शिया 28 व 29 रजब को मजलिस जुलूसों का आयोजन करके हजरत इमाम हुसैन एवं उनके साथियों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं। हजरत इमाम हुसैन की कुर्बानी ने कयामत तक अर्थात् अनन्त काल तक के लिये मानव समाज के सिर को ऊंचा कर दिया है। मानवीय मूल्यों का महत्व कर्बला की मार्मिक घटना से प्राप्त होता है। इस्लाम का मूल उद्देश्य इंसानी समाज को स्वाभिमान के साथ जीवन जीने का है। इमाम हुसैन ने इंसानों को स्वाभिमान से जीने का सलीका बताया है। उनका यह कथन आज भी मानव समाज के मस्तक को ऊंचा करता है- जिल्लत की जिन्दगी से इज्जत की मौत बेहतर है’। मौलाना ने इमाम हुसैन के मदीने से शुरू हुये सफर मक्का के प्रवास एवं कर्बला तक के सफर का वृतान्त विस्तार से बताया। अन्त में इमाम हुसैन की शहादत का जिक्र किया जिसको सुनकर उपस्थित जनसमूह की आंखें नम हो गयीं। बाद खत्म मजलिस ताबूत इमाम हुसैन, अलम, झूला बरामद हुआ एवं उपस्थित जनसमूह ने दहकते हुये अंगारे के ऊपर मातम करते हुये ‘या हुसैन-या हुसैन’ की सदा बुलन्द की। अंगारे के मातम के दौरान नसीम हसन बारादुअरिया की तकरीर हुई व अंजुमन जाफरी के दस्ते ने नौहाखानी व सीनाजनी की।




