अज़ादारी अहलेबैत को चाहने वालों की रूह है इसलिए अज़ादारी तो हो के रहेगी | अज़ादारी का नाम आते ही पैगम्बर ऐ इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स ) के नवासे इम...
अज़ादारी अहलेबैत को चाहने वालों की रूह है इसलिए अज़ादारी तो हो के रहेगी |

अज़ादारी का नाम आते ही पैगम्बर ऐ इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स ) के नवासे इमाम हुसैन ,उनके परिवार और सहबियों पे कर्बला में हुए ज़ुल्म को याद करके आंसू बहाने वाले मुसलमानो का ख्याल ज़हन में आने लगता है | यह इमाम हुसैन (अ )की शहादत पे रोना वास्तव में उनके पवित्र उद्देश्यों पर दिल व जान से वफादारी और मज़लूमो से सहानुभूति का प्रतीक है|
इस अज़ादारी की शुरुआत कर्बला में उसी वक़्त शुरू हो गयी थी जब जनाब ऐ ज़ैनब और इमाम हुसैन (अ ) के घराने की औरतों ने कर्बला में उन सबकी शहादत के बाद उनके लाशों के पास जा के गिरया किया और उनकी शहादत की क़ुबूलियत और मक़सद की कामयाबी की दुआ की थी | फिर यह अज़ादारी का अंदाज़ जनाब ऐ ज़ैनब ने कई जगह दिखाया लेकिन जब यह सब यज़ीद के क़ैदी शाम की क़ैद से रिहा हुए तो जनाब ऐ ज़ैनब ने एक जगह मांगी जहाँ वे बैठ के इमाम हुसैन पे खुल के रो सकें और यहाँ पे जनाब ऐ ज़ैनब ने सिर्फ गिरया ही नहीं किया बल्कि लोगों को यह भी बताया की यज़ीद ने ज़ुल्म किसपे किया और इमाम हुसैन ने क़ुरबानी क्यों दी | इस क़ुरबानी का मक़सद अल्लाह के दीन को बचाना था इस्लाम को ज़ालिमों के शिकंजे से छुड़ाना था |

फिर यह अज़ादारी अहलेबैत और उनके चाहने वालों की रूह बन गया और जनाब ऐ ज़ैनब से , इमाम हुसैन के बेटे इमाम ज़ैनुल आबेदीन ने इसी मदीने में आगे बढ़ाया और छठे इमाम जाफर ऐ सादिक़ के दौर तक इसने मर्सिये की शक्ल ले ली और आशूरा के दिन दूर दूर से लोग बुलाय जाते रहे | फिर इसमें सौज सलाम नौहा हदीस का शुमार हुआ और आज से सवा सौ साल पहले जुलूस ऐ अज़ादारी होने लगी जिसमे अलम हज़रत अब्बास अलमदार, ज़ुल्जिनाह ताबूत तुर्बत झूला वगैरह का शुमार हुआ जिसका मक़सद सिर्फ कर्बला के शहीदों की क़ुरबानी के मक़सद को याद करना और उनपे हुए ज़ुल्म को याद करके आंसू बहाना होता है |
इस तरह यह अज़ादारी इमाम हुसैन की कर्बला में शहादत के फ़ौरन बाद से शुरू हुयी और आज तक ज़िंदा है बस इसका अंदाज़ बदलता रहा मक़सद एक रहा |
आज कोरोना जैसी महामारी से पूरी दुनिया जूझ रही है और इस से बचने का एक ही तरीक़ा है वो हैं एक दूसरे से कुछ दूरी बना के मिलना जुलना |
अगर जुलुस ऐ अज़ादारी से किसी हुसैन के चाहने वाले की जान को खतरा हो तो बेहतर यही है की अज़ादारी के इस अंदाज़ को बदलते हुए , सोशल डिस्टन्सिंग का ख्याल रखते हुए अपने घरों में मजलिस , सौज सलाम मर्सिया हदीस के ज़रिये अज़ादारी को इस साल आगे बढ़ाया जाय |
- इस साल मुहर्रम की तैयारी के लिए बहुत से समझदार इदारे और उनसे जुड़े पढ़े लिखे लोग इस बात की फ़िक्र करने और एहतेमाम करने में लगे हैं की कैसे सोशल डिस्टन्सिंग का ख्याल रखते हुए अज़ादारी की जायगी लेकिन इसी के साथ साथ अफ़सोस यह देख के होता है की कुछ इदारे सिर्फ वाह वाही के लिए , नाम औ नमूद के लिए सोशल मीडिया के ज़रिये लेटर या ज्ञापन के ज़रिये प्रशासन पे दबाव डालने की बात कर रहे हैं की उन्हें जुलुस की इजाज़त दी जाय जबकि वे सब जानते हैं जब जुमा की इजाज़त नहीं मिली , ईद बक़रीद में नमाज़ की इजाज़त नहीं मिली तो सड़कों पे जुलुस की इजाज़त कैसे मिल जायगी और अगर मिल भी जाय तो भी कोरोना को देखते हुए यह मुनासिब भी नहीं होगा|
इस तरह की जाती फायदे के लिए अज़ादारी का इस्तेमाल करना लोगों के जज़्बात से खेलना मुनासिब नहीं | अज़ादारी न कभी बंद हुयी है और न हो सकती है क्यों की हुसैन का ग़म हमारे दिलों में हैं | बेहतर है की सोशल डिस्टन्सिंग का ख्याल रखते हुए इमामबाड़ों के अंदर मजलिस नौहा मातम की इजाज़त मांगी जाय और उसका पुख्ता इंतज़ाम किया जाय और यह तब मुमकिन है जब हम कम से कम हुसैन मज़लूम की अज़ादारी के नाम पे एक हो के अपनी बात प्रशासन के सामने मज़बूत तरीके से रखें |
- तय कर लें की इस साल सोशल डिस्टन्सिंग का ख्याल रखते हुए घरों में फर्श ऐ अज़ा बिछाएंगे |
- सोशल मीडिया के ज़रिये पैग़ाम ऐ हुसैनी (मजलिस ) लोगों तक पहुंचाएं |
- जुलुस की इजाज़त अगर मिली तो तबर्रुकात की ज़ियारत हाथ से चूम के नहीं बल्कि इशारों से करेंगे |
- मास्क ज़रूर लगाएं |
- तबर्रुक सूखी चीज़ों का बांटें और बिरयानी , वगैरह खाने के इंतज़ाम से परहेज़ करें |
- मजलिसों का एहतेमाम करें लेकिन सोशल डिस्टन्सिंग का ख्याल रखते हुए |
- लेकिन अज़ादारी उसी खुलूस और जोश के साथ इस साल भी अंजाम दें |
- प्रशासन से समझा के इजाज़त अवश्य लें और उनकी गाइड लाइन ला पालन करे |


