Jaunpur azadari,Muharram1435
हज़रत मुस्लिम की शहादत के बाद से कूफ़े की गलियों में सन्नाटा छाया रहता था। इमाम हुसैन का पत्र बहुत ही कठिनाई से कूफ़ा पहुंचा। सूर्य अस्त हो चुका था। हबीब खाना खा रहे थे। इसी बीच दास ने पत्र लाकर दिया। हबीब ने पूछा कि किसका पत्र है? दास ने उत्तर दिया कि कोई कर्बला से आया है। हबीब ने पत्र खोला, पढ़ना आरंभ किया। कुछ समय के लिए वे मूक से हो गए। उनकी पत्नी निकट आई। पति की हार्दिक व्याकुलता को भांप कर पूछा एसा क्या लिखा है इस पत्र में कि तुम इतने व्याकुल हो गए हो? हबीब ने उत्तर दिया कि पैग़म्बरे इस्लाम के नाती इमाम हुसैन को यज़ीदी सेना ने कर्बला में घेर लिया है। उन्होंने मुझे अपना साथ देने के लिए बुलाया है। यह सुनते ही हबीब की पत्नी ने कहा है कि पैग़म्बरे इस्लाम का सपूत बुलाए और तुम सोच में पड़ जाओ। यदि नहीं जाना चाहते तो यह मेरी ओढ़नी तुम ओढ़ो। मैं स्वयं अपने इमाम की सहायता के लिए जाऊंगी। हबीब शायद कूफ़े की परिस्थिति के बारे में विचार कर रहे थे। वे सोच रहे थे कि कूफ़े से कैसे निकला जाए परन्तु पत्नी को कुछ क्षण की देर भी अच्छी न लगी। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के प्रति पत्नी की इस श्रद्धा को देखकर अत्याधिक संतोष प्राप्त हुआ। इबीब घर से विदा हुए और रात्रि के अंधकार में सरकारी सिपाहियों से बचते हुए नगर के बाहर पहुंचे जहां उनका एक विश्वसनीय दास एक घोड़े के साथ उनकी प्रतीक्षा कर रहा था। हबीब को पहुंचने में कुछ देर हुई थी अतः दास यह समझ रहा था कि उसका स्वामी अपनी जान बचा रहा है। वह घोड़े को संबोधित करते हुए कह रहा था कि “हे पशु, तेरी ही भांति मैं भी तैयार हूं। यदि मेरा स्वामी न आया तो मैं स्वयं हुसैन की सहायता के लिए जाऊंगा। हबीब ने जब अपने दास के यह शब्द सुने तो वे रोने लगे। उन्होंने स्वयं से कहा कि मेरे न्याय के प्रतीक हुसैन पर यह कैसा समय आ गया है कि मित्र ही नहीं बल्कि दास भी उसके लिए व्याकुल हैं।
कर्बला का युद्ध भी बड़ा अनोखा युद्ध था। एक ओर यज़ीदी सेना ने अत्याचार और अधर्म के किसी भी हथकंडे को हुसैन के विरुद्ध प्रयोग करने से हाथ पीछे नहीं खींचा था तो दूसरी ओर हुसैन अपने मानवाप्रेमी ईश्वरीय सिद्धांतों के किसी भी आयाम को संसार के सामने प्रस्तुत करने से नहीं चूके थे। उनके नाना पैग़म्बरे इस्लाम और समस्त परिवार ने उच्च चरित्र तथा ईश्वरीय प्रेम को मनुष्य के बड़े एवं महान होने की कसौटी बताय था। इसी आधार पर अफ़्रीकी देशों से आए हुए कितने ही दासों को पैग़म्बरे इस्लाम अत्यधिक महत्व देते थे। इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की दृष्टि में भी मनुष्य के चरित्र का महत्व था, उसके रंगरूप, वंश या भाषा का नहीं। इसीलिए इतिहास ने करबला में जहां एक ओर इबीब इब्ने मज़ाहिर और उन जैसे बड़ी आयु के अनेक लोगों को इमाम हुसैन पर अपना जीवन न्योछावर करते देखा वहीं अनेक दासों ने भी स्वेच्छा से हुसैन और उनके उद्देश्यों के लिए मृत्यु को हंसकर गले लगा लिया। एसे ही एक ग़ुलाम जौन भी थे। अपने स्वामी अबूज़र ग़फ़्फ़ारी के स्वर्गवास के पश्चात उनका समस्त जीवन इमाम हुसैन के पिता हज़रत अली के घर में व्यतीत हुआ। आशूर के दिन जब जौन ने इमाम हुसैन से रणक्षेत्र में जाने की अनुमति मांगी और इमाम हुसैन ने उन्हें रोकना चाहा तो हज़रत जौन ने रोकर कहा कि क्या आप मुझे यह सौभाग्य देना नहीं चाहते हैं कि मेरा ख़ून आपके सुगन्धित ख़ून से मिल सके। यह सुनकर इमाम हुसैन ने उन्हें अपने सीने से लगा लिया। फ़ुरात के तट पर ख़ैमे लगे अभी दो दिन ही बीते थे कि यज़ीद के सेनापति उमरे साद की ओर से यह संदेश आया कि नदी से दूर जाकर ख़ैम लगाए जाएं। यह सुनकर इमाम हुसैन के वीर साथियों को क्रोध आ गया, जिनमें उनके भाई अब्बास, सुपुत्र अली अकबर और भतीजे, भांजे व मित्र सभी सम्मिलित थे। उन्होंने नदी का तट छोड़ने से इन्कार कर दिया परन्तु इमाम हुसैन, शत्रु को युद्ध छेड़ने का बहाना नहीं देना चाहते थे अतः उन्होंने ख़ैमों को नदी से दूर ले जाकर लगा दिया। शत्रु की सेना की संख्या प्रतिदिनि बढ़ रही थी। लोभियों और भौतिकवादियों की भीड़, सत्यवादी हुसैन की छोटी सी ईश्वरीय सेना को चारों ओर से घेर रही थी। उधर इमाम हुसैन ने भी जागृत आत्मा वाले अपने कुछ मित्रों को पत्र भेजकर बुलाया था ताकि वे भी भटके हुए शत्रुओं को बुराई से रोकने और भलाई की ओर बुलाने में उनका साथ दें तथा अंत में सत्य की वेदी पर जीवन की भेंट चढ़ाकर अमर हो सकें।


