शाह का पंजा जिसे पंजे शरीफ भी कहते हैं जौनपुर का मुग़ल दौर का बना ऐतिहासिक इमामबाड़ा है | यह इमामबाड़ा भी मन्नत और मुरादों के लिए बहुत मशहूर...
शाह का पंजा जिसे पंजे शरीफ भी कहते हैं जौनपुर का मुग़ल दौर का बना ऐतिहासिक इमामबाड़ा है | यह इमामबाड़ा भी मन्नत और मुरादों के लिए बहुत मशहूर है | जहांगीर के दौर में ख्वाजा मीर के बेटे सय्यिद अली जब मदीने गए तो वहाँ से हजरत अली (अ.स) का निशाँ ऐ दस्त और रसूल ऐ खुदा हजरत मुहम्मद (स.अ.व) के क़दमों के निशाँ ले आये | यह १६१३ ईस्वी और १०२१ हिजरी का दौर था | इनको नसब करने के लिए सय्यिद अली साहब ने एक बड़ा हाथा और बुलंद दरवाज़ा बनवाना शुरू किया लेकिन मुकम्मल होने के पहले ही उनका इन्तेकाल हो गया | इसको बाद में चमन बेगम ने मुकम्मल करवाया और पंजे शरीफ के बुलंद दरवाज़े पे लिखवाया |
रौज़ा ऐ शाह ऐ नजफ़ कर्द चमन चू तामीर,......
इसी चमन बेगम की बेटी नवरतन ने रौज़ा ऐ हजरत अब्बास अलमदार पंजे शरीफ को १२९८ हिजरी में बनवाया और उसके दरवाज़े और दालान को रईस जौनपुर जनाब मदद अली खान साहब ने बनवाया |

रौज़ा ऐ शाह ऐ नजफ़ कर्द चमन चू तामीर,......
इसी चमन बेगम की बेटी नवरतन ने रौज़ा ऐ हजरत अब्बास अलमदार पंजे शरीफ को १२९८ हिजरी में बनवाया और उसके दरवाज़े और दालान को रईस जौनपुर जनाब मदद अली खान साहब ने बनवाया |

पंजे शरीफ 1995




