मदीने से चला काफिला

हुर्र ने अपने से बड़े ओहदेदार के हुक्म को मानते हुए कूफ़े से कुछ मील पहले ही इमाम हुसैन के काफिले के पास दोपहर के वक़्त पहुंचा । हुर्र और उसकी फ़ौज उस वक़्त बहुत प्यासी थी तो उसने इमाम हुसैन से पानी माँगा । इमाम हुसैन ने अब्बास ,अलीअकबर और क़ासिम को हुक्म दिया की सबको पानी पिलाया जाय और उनकी फ़ौज के घोड़ो को भी पानी से सैराब किया जाय ।
जब सब पानी पी चुके तो ज़ुहर की नमाज़ हुयी जिसे इमाम हुसैन ने पढ़ाया और हुर्र की फ़ौज ने भी इमाम के पीछे नमाज़ पढ़ी । जब नमाज़ हो गयी तो हुर्र ने हुक्म सुनाया की उसे हुक्म दिया गया है की कूफ़े की तरह हुसैन को ना आने दिया जाय उस वक़्त तक जब तक वो यज़ीद की बैय्यत ना कर लें ।
इमाम हुसैन ने फरमाया यज़ीद एक ना इंसाफी करने वाला ज़ालिम बादशाह है जिसका मक़सद इस्लाम को नुकसान पहुंचाना है इसलिए बैय्यत मुमकिन नहीं और यह कह के कूफा की तरफ बढे की उन पे ज़रूरी है की वो कूफा जाएँ क्यों की वहाँ के लोगों ने हज़ारों खत लिख के उन्हें बुलाया है ।
इमाम हुसैन के पास दो ही रास्ते थे की या तो वो हुर्र से जंग करते या उसके कहने के हिसाब से रास्ता बदल देते । इमाम हुसैन अपनी तरफ से कोई जंग नहीं शुरू करना चाहते थे इसलिए उन्होंने कहा ठीक है वो दुसरे रास्ते पे चले जाते हैं लेकिन हुर्र ने कहा उसे हुक्म है की वो हुसैन के साथ अपने १००० सिपाहियों के साथ रहे और काफिले का रुख कर्बला की तरफ मोड़ दिया गया ।
२ मुहर्रम को काफिला एक बियाबान में पंहुचा और जब लोगों से पुछा गया तो लोगों ने बताया इसे नैनवा कहा जाता है और कुछ लोग इसे कर्बोबला भी कहते हैं । बस इतना सुन ना था की इमाम हुसैन ने वहीँ काफिले तो रोक दिया और वहाँ आस पास आबादी की तलाश करने लगे । काफी दूर एक क़बीला बनी असद रहता था वहाँ के लोगों को बुलाया और पुछा यह ज़मीन किसकी है ? बात चीत के बाद उस ज़मीन को खरीद लिया और काफिले ने वहाँ पे अपना टेंट लगा दिया ।
उसी दिन यज़ीद की फ़ौज का कमांडर उम्र बिन साद अपने ४००० सिपाहियों के साथ कर्बला पहुंचा । उम्र बिन साद इमाम हुसैन से पहले भी मिल चुका था इसलिए उन्हें जानते हुए उनके पीछे नमाज़ पढ़ी ।
जब इब्ने ज़ियाद को ये पता चला तो वो घबरा गया और अपनी फ़ौज के एक ज़ालिम कमांडर शिमर को १०००० के लश्कर के साथ भेजा और हुर्र को हुक्म दिया की इमाम के खेमे दरिया किनारे से हटा दिए जाएँ । हुसैन से बैयत ली जाय या फिर उनका सर क़लम कर दिया जाय । ७ मुहर्रम से इमाम हुसैन के किसी भी शख्स को नहर ऐ फुरात से पानी ना लेने दिया गया । इस वक़्त तक हुर्र ,शिमर और उम्र बिन साद कर्बला में थे और पानी बंद करने का हुक्म जारी इब्ने ज़्याद के हुक्म से कर चुके थे ।
जब शब ऐ आशूरा आई ९ मुहर्रम का दिन ढल चुका था और रात हो चुकी थी की हुर्र को एक बेचैनी सी महसूस महसूस होने लगी । हुसैन के खेमे से अल अतश ,है प्यास की सदायें आ रही थी ,बच्चों के रोने की आवाज़ें आ रही थी और उधर हुर्र बेचैन टहल रहा था और सोंच रहा था यह उसने क्या किया ? क्या जवाब देगा वो रसूल (स अ व ) की बेटी फातिमा को ? क्या अल्लाह उसे माफ़ करेगा ? पूरी रात बेचैनी पे कटी और सुबह होने से ठीक पहले उसने फैसला कर लिया और अपने बेटे और एक ग़ुलाम के साथ हुर्र चला इमाम हुसैन की तरफ और उनके क़दमों में गिर गया ।
इमाम हुसैन ने हुर्र से कहा ऐ हुर्र मैंने भी तुम्हे माफ़ किया और नाना मुहम्मद (स अ व ) ने भी तुम्हे माफ़ किया ।
सुबह की नमाज़ इमाम हुसैन (अ स) के लश्कर के साथ हुर्र ने भी पढ़ी और अभी नमाज़ हो ही रही थी की लश्कर ऐ यज़ीद की तरफ से तीरो की बारिश होने लगी जिसमे ३० लोग शहीद हो गए ।
इतना देखना ना था की हुर्र ने इजाज़त मांगी ऐ मौला हुसैन मुझे दुश्मनो से जंग की इजाज़त दे दें । इमाम हुसैन ने कहा की ऐ हुर्र तुम मेरे मेहमान हो और इस वक़्त तो मैं तुम्हे पानी भी नहीं पिला सकता । हुर्र ने सबसे पहले यज़ीद के हमले का जवाब दिया और बड़ी बहादुरी से लड़ा और आखिर में अपने बेटे और गुलाम के साथ हुसैन अ स के ऊपर खुद को क़ुर्बान कर दिया ।
हुर्र एक उदाहरण है की कैसे एक रात में कोई जहन्नम से जन्नत की तरफ बातिल से हक़ की तरफ अल्लाह की हिदायत पे आता है और हिदायत तब हुआ करती है जब किसी को इमाम की मारेफ़त हासिल हो जाय ।


