हबीब इब्ने मज़ाहिर, मदीने से चला काफिला
इमाम हुसैन जब कर्बला पहुंचे और यज़ीद ने लश्कर पे लश्कर भेजना शुरू कर दिया तो जनाब ऐ ज़ैनब ने इमाम से पूछा ये लश्कर पे लश्कर क्यों आ रहे हैं । इमाम ने जवाब दिया मुझसे बैय्यत तलब करने और इंकार करने पे मुझे क़त्ल करने । जनाब ऐ ज़ैनब की आँखों में आंसू आ गए और पूछा भैया आपके पास तो सिर्फ ७२ हैं क्या कोई और नहीं जिसको बुलाया जा सके । इमाम हुसैन ने कहा बहन ज़ैनब झूठे बहुत से मददगार पैदा कर लेते हैं लेकिन सच की राह पे चलने वालो को सिर्फ गिनती के कुछ ही साथी मिला करते हैं ।
अगले दिन इमाम हुसैन ने अपने बचपन के दोस्त हबीब इब्ने मज़ाहिर को एक खत लिखा और क़ासिद के हाथो कूफा भिजवा दिया जिसमे लिखा था की यज़ीद ने कैसे उन्हें धोके से कर्बला में घेर रखा है । जब क़ासिद खत ले के पहुंचा तो हबीब अपने बेटे और बीवी के साथ नाश्ता कर रहे थे । हबीब ने इमाम के खत को चूमा और पढ़ते ही उनकी आँखों से आंसू जारी हो गए । हबीब की बीवी ने पुछा क्या माजरा है तो हबीब ने जवाब दिया किसको दिन यह भी आ जाएगा यह खुद को मुसलमान कहने वाले लोग जिसकी शहादत अज़ान में देते हैं उसी के नवासे के खून के प्यासे हो जाएंगे ।
हबीब इब्ने मज़ाहिर फ़ौरन कर्बला की तरफ जाने को तैयार हो गए और अपने एक गुलाम से कहा की जाओ घोड़े को ले के कूफ़े के बाहरी हिस्से में जाओ और अगर कोई पूछे तो कह देना घोड़े को घास खिलाने लाये हो । जैसे ही नमाज़ ऐ असर का वक़्त हुआ जब सभी लोग नमाज़ में थे हबीब इब्ने मज़ाहिर निकल पड़े कर्बला की तरफ और शाम होते होते कर्बला पहुंच गए और जैसे ही इमाम हुसैन ने देखा हबीब आये हैं खेमे में शोर हुआ हबीब मदद को आये हैं । इमाम ने उन्हें बढ़ के गले लगाया और जैसे ही जनाब ऐ ज़ैनब ने सुना फ़ौरन फ़िज़्ज़ा से हबीब को सलाम कहलवाया । हबीब रोने लगे और बोले कितने खुशकिस्मत हैं हुसैन के असहाब की फातिमा ज़हरा उन्हें सलाम कहती है ।
१० मुहर्रम आशूरा के रोज़ नमाज़ ऐ ज़ुहर के बाद हबीब इब्ने मज़ाहिर ने मैदान ऐ जंग का रुख इमाम की इजाज़त से किया ,बहादुरी से लड़े और शहीद हुए । जब हबीब घोड़े से गिरे तो आवाज़ दी इमाम को और इमाम फ़ौरन दौड़े मैदान ऐ जंग तरफ । हबीब का सर गोद में रखा और हबीब बोले मुझे माफ़ कर दें की इस ज़िन्दगी से ज़्यादा मैं आप को कुछ नहीं दे सका और इमाम ऐ हबीब मेरे दोस्त कह के रोते रहे ।


