हज़रत क़ासिम बिन हसन, मदीने से चला काफिला
हज़रत क़ासिम बिन हसन इमाम हसन के सबसे छोटे बेटे थे जिनका जन्म इमाम हसन की शहादत की तीन वर्ष पहले हुआ था । जब इमाम हसन मदीने से रवाना होने लगे तो जनाब ऐ क़ासिम की माँ उम्मे फरवा ने खुद और क़ासिम को भी ले चलने के लिए कहा जिसे इमाम हुसैन ने मान लिया ।
जनाब ऐ क़ासिम ने भी हथियार चलना हज़रात अब्बास अलमदार से सीखा था । जब क़ासिम कर्बला में पहुंचे तो उनकी उम्र सिर्फ १३ साल की थी । शब ऐ आशूर की रात जब इमाम हुसैन जनाब ऐ क़ासिम के खेमे से गुज़रे तो उन्होंने क़ासिम को अपनी माँ से कहते सुना की अम्मा मैं और अली अकबर और क़ासिम ऑन और मुहम्मद कल चाचा हुसैन पे क़ुर्बान होंगे । अम्मा मेरे जाने के बाद आंसूं ना बहाना । उम्मे फरवा ने कहा बेटा मुझे फख्र है कि मेरा बेटा अपने बाप की तरफ से हुसैन पे क़ुर्बान होगा । जब इमाम हुसैन ने सुना तो उन्होंने दुआ की अल्लाह इन दोनों पे रहमत नाज़िल कर ।
आशूरा के दिन जब ऑन औ मुहम्मद शहीद हो चुके तो क़ासिम अपने चाचा हुसैन के पास जंग की इजाज़त मांगने आये लेकिन हुसैन ने कहा बेटा तुम अभी बहुत छोटे हो और अपनी माँ की अकेली औलाद हो तुम्हे कैसे इजाज़त दे दूँ ।
क़ासिम जब मायूस हो गए तो अपनी माँ उम्मे फरवा के पास गए और बड़े परेशान दिखे । उम्मे फरवा को याद आया की जब हसन का आखिरी वक़्त था तो उन्होंने एक तावीज़ दी थी और कहा था जब कोई बड़ी मुश्किल पेश आये तो इसे खोल के देख लेना । उम्मे फरवा उम्मे फरवा ने उस तावीज़ को खोला तो उसमे इमाम हुसैन के नाम एक खत लिखा था जिसमे उन्होंने क़ासिम से कहा था की जब इस्लाम पे कोई वक़्त आये तो तुम उस वक़्त इस्लाम के नाम पे अपनी क़ुरबानी पेश कर देना । क़ासिम के चेहरे पे ख़ुशी के आसार नमूदार हुए और वो भागते हुए चाचा हुसैन के पास पहुंचे और खत उनके हवाले कर दिया ।
हुसैन ने कहा बेटा अब मैं तुम्हे कैसे रोक सकता हूँ जब तुम्हारे बाबा ही ने तुम्हे इजाज़त दे दी और इतना कह के क़ासिम के सर पे अमामा खुद बाँधा और उन्हें खुद घोड़े पे सवार किया । क़ासिम उम्र में बहुत छोटे थे की घोड़े पे ठीक से बैठ भी नहीं पा रहे थे तो इमाम हुसैन देखते जाते और कहते जाते "इन्ना लिल्लाहि व इना इलैहे राजउन " जनाब ऐ क़ासिम ने कहा चाचा आप परेशान मत होइए मैं जंग करना जानता हूँ । जनाब ऐ क़ासिम बहुत ही खूबसूरत थे और उनको आते देख लश्कर कहने लगा की कैसे इसे शईद करें जिसका चेहरा चाँद की तरह चमक रहा है ।
जनाब ऐ क़ासिम ने बहादुरी से जंग की और कई बड़े बड़े योद्धाओं को वासिल ऐ जहन्नम किया लेकिन प्यास कम उम्र ने उन्हें दिया । ऐ चाचा क़ासिम का आखिरी सलाम लें और अब्बास और हुसैन मैदान की तरफ दौड़े लेकिन जब तक पहुँचते जनाब ऐ क़ासिम का लाषा घोड़ों से पामाल हो चूका था ।
इमाम हुसैन ने अपनी एबा को फैलाया और क़ासिम के टुकड़ों को जमा किया और खेमे में आये
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