मदीने से चला काफिला
ऑन की उम्र १३ साल की थी और मुहम्मद उस से दो साल छोटा था और इन दोनों ने हथियार चलना हज़रात अब्बास से सीखा था । शब ऐ आशूर जब आई तो ज़ैनब ने दोनों बेटों को बुलाया और कहा मैं तुम्हे जिहाद के लिए नहीं कहूँगी लेकिन अगर हुसैन पे वक़्त आ जाय तो ऐसा ना हो की वो शहीद हो जाएँ और तुम ज़िंदा रहो ।
दोनों ने एक साथ कहा के अम्मा मत घबराएं हम में हज़रत अली और जाफर ऐ तैय्यार का खून है और बहादुरी में हम उन्ही की मिसाल क़ायम करेंगे । बेटो की बात सुनके जनाब ऐ ज़ैनब की आँखों से आंसू जारी हो गया और अपने बेटों को गले लगा लिया ।
सुबह ऐ आशूर जब यज़ीदी लश्कर ने हमला किया तो ऑन और मुहम्मद , जनाब ऐ क़ासिम, अली अकबर के साथ हमले का जवाब देने लगे और जब जब ऑन और मुहम्मद हमला करते अपने मामू हज़रत अब्बास की तरफ ज़रूर देखते जो खुश हो के दोनों की बहादुरी से जंग देख रहे थे ।
जब एक एक करके लोग शहीद हो गए तो जनाब ऐ ज़ैनब अपने भाई हुसैन के पास गयीं और बोली जंग ऐ सिफ़्फ़ीन में हज़रात अब्बास सिर्फ ८ साल के थे और हज़रत अली उन्हें जंग करते देख के खुश हो रहे थे । क्या आप भी मुझे आज खुश होते देखना चाहते हैं तो मेरे बेटो ऑन और मुहम्मद को जंग की इजाज़त दे दें । इमाम हुसैन ने जनाब ऐ ज़ैनब को देखा जिसकी आँखों से आंसू बह रहे थे और दो घोड़े मंगवाए और ऑन और मुहम्मद को खुद सवार किया ।
ऑन और मुहम्मद इतनी बहादुरी से जंग करने लगे की उम्र साद ने कहा यह कौन बच्चे हैं ऐसा लगता है अली जंग कर रहे हैं । जब लोगो ने बताया की यह जाफर ऐ तैयार पे पोते और अली के नवासे हैं तो उसने जितनी जल्द हो इन्हे घेर के क़त्ल करो ।
चारों तरफ से यज़ीदी फ़ौज ने दोनों को घेर लिया लेकिन फिर भी दोनों लड़ते लड़ते बहुत दूर निकल आये लेकिन कितना लड़ते हज़ारों की फ़ौज से और दोनों ने शहादत पायी और जैसे ही घोड़े से गिरे अब्बास और हुसैन ने दोनों को उठाया और उनका लाश ले के खेमे में आये और देखा की ज़ैनब सजदे में सर रखे अल्लाह कर रही हैं ।


