मदीने से चला काफिला कर्बला में लुट के कैसे मदीने वापस पहुंचा ।
कर्बला की कहानी ५ सफरों की भरी कहानी है ।
ये बात २० रजब सन ६० हिजरी की है जब मुआव्विया की मृत्यु हो गयी और यज़ीद ने खुद को मुसलमानो का खलीफा घोषित कर दिया ।
यहां ये बात बताता चलूँ कि जब इस्लाम के पैग़ाम हज़रत मुहम्मद (स.अ व ) लोगो तक पहुंचा रहे थे तो इसी मुआव्विया का बाप अबु सूफियान सबसे अधिक उनको परेशान किया करता था लेकिन बाद में उसने इस्लाम धर्म क़ुबूल कर लिया लेकिन मुआव्विया यमन की तरफ भाग गया और इस्लाम को क़ुबूल नहीं किया लेकिन बाद में उसने भी इस्लाम को क़ुबूल कर लिया ।
लेकिन अपने बाप की तरह हमेशा मुआव्विया भी हज़रत मुहम्मद (स.अ व ) और उनके घराने का दुश्मन रहा ।जब हज़रत अली (अ.स ) खलीफा बने तो मुआव्विया ने शाम से खुद की खिलाफत का ऐलान कर दिया । मुआव्विया को कभी इस्लाम धर्म में दिलचस्पी नहीं रही बल्कि सत्ता हासिल करने के लिए इसका इस्तेमाल किया करता था ।
मुआव्विया की मृत्यु के बाद जब यज़ीद ने खुद को मुसलमानो का खलीफा घोषित किया तो उसके सामने समस्या यह आई की वो हज़रत मुहम्मद (स.अ व ) के घराने के लोगों की सहमति कैसे हासिल करे ? यज़ीद ने वलीद को यह ज़िम्मेदारी सौंपी और २७ रजब को वलीद ने इमाम हुसैन और उनके घराने वालों को बुला भेजा लेकिन वहाँ पे बैयत में मामले में बहस हो गयी और इमाम हुसैन इंकार करके चले आये लेकिन आने के साथ ही अपने घराने वालों से कहा सफर की तैयारी करो ।
इमाम हुसैन (अ.स ) हज़रत मुहम्मद (स.अ व ) के नवासे थे और यह कैसे संभव था कि वो यज़ीद जैसे ज़ालिम और बदकार को खलीफा मान लेते ? इमाम हुसैन ने नेकी की दावत देने और लोगों को बुराई से रोकने के लिए अपना पहला सफर मदीने से मक्का का शुरू करने का फैसला कर लिया ।
पहला सफर
इमाम हुसैन (अ.स ) मस्जिद ए नबवी में गयी चिराग़ को रौशन किया और हज़रत मुहम्मद (स.अ व ) की क़ब्र के किनारे बैठ गए और अपने गाल क़ब्र पे रख दिया यह सोंच के की क्या जाने फिर कभी मदीने वापस आना भी हो या नहीं और कहाँ नाना आपने जिस दीन को फैलाया था उसे उसकी सही हालत में बचाने के लिए मुझे सफर करना होगा । अल्लाह से दुआ कीजेगा की मेरा यह सफर कामयाब हो ।
उसके बाद इमाम हुसैन अपनी माँ जनाब ऐ फातिमा स अ की क़ब्र पे आये और ऐसे आये जैसे कोई बच्चा अपनी माँ के पास भागते हुए आता है और बस चुप चाप बैठ गए और थोड़ी देर के बाद जब वहाँ से जाने लगे तो क़ब्र से आवाज़ आई जाओ बेटा कामयाब रहो और घबराओ मत मैं भी तुम्हारे साथ साथ रहूंगी ।
अपने नाना हज़रत मुहम्मद (स.अ व ) और माँ जनाब ऐ फातिमा से विदा लेने के बाद इमाम अपनी बहन जनाब ऐ ज़ैनब के पास पहुंचे और अपने बहनोई अब्दुल्लाह इब्ने जाफर ऐ तैयार इब्ने अबु तालिब से इजाज़त मांगी की ज़ैनब और दोनों बच्चों ऑन मुहम्मद को सफर में साथ जाने की इजाज़त दे दें । जनाब अब्दुल्लाह ने इजाज़त दे दी ।
इधर मर्दो में हज़रत अब्बास ,जनाब ऐ क़ासिम , सब सफर पे जाने की तैयारी करने लगे यहां तक की ६ महीने के जनाब ऐ अली असग़र का झूला भी तैयार होने लगा । यह सब बिस्तर पे लेटी इमाम हुसैन की ८ वर्षीय बेटी सुग़रा देख रही थी और इंतज़ार कर रही थी की बाबा हुसैन आएंगे और उसे भी चलने को कहेंगे ।
इमाम हुसैन बेटी सुग़रा के पास आये और कहा बेटी जब तुम पैदा हुयी थी तो तुम्हारा नाम मैंने अम्मा के नाम पे फातिमा रखा था और मेरी माँ साबिर थी तुम भी सब्र करना और यहीं मदीने में उम्मुल बनीन और उम्मे सलमा के साथ रहना । बीमारी में सफर तुम्हारे लिए मुश्किल होगा और हम सब जैसे ही किसी मक़ाम पे अपना ठिकाना बना पाएंगे वैसे ही तुमको भी बुला लेंगे । बाबा का कहा बेटी कैसे टाल सकती थी बस आँख में आंसू आये और उन्हें पी गयी और चुप रही लेकिन एक आस थी की चाचा अब्बास है शायद उनके कहने से उसे बाबा साथ ले जाएँ ।
हज़रत अब्बास अलमदार और जनाब ऐ अली अकबर सुग़रा से मिलने आये लेकिन सुग़रा को वही जवाब दिया जो इमाम हुसैन ने दिया था और जब हर उम्मीद टूट गयी सुग़रा की तो बोली भैया अली अकबर जब तुम्हारी शादी हो जाय और मैं तुम्हारे मदीने वापस आने पे दुनया से चली जाऊं तो अपनी बीवी के साथ मेरी क़ब्र पे ज़रूर आना ।
हज़रत अब्बास और जनाब ऐ अली अकबर ने आंसुओं से भरी आँखों से सुग़रा को रुखसत किया ।
काफिला सुबह का सूरज निकलते ही चलने के लिए तैयार हो गया । एक तरफ उम्मे सलमा थी तो दूसरी तरफ उम्मुल बनीन और सुग़रा ने सभी को अलविदा कहा और सुग़रा ने अपने भाई जिसके साथ खेल करती थी उसे भी प्यार किया और अली असग़र माँ लैला के हवाले कर दिया ।
काफिला चल पड़ा सुग़रा सबको मुस्करा के अलविदा कह रही थी और बाबा हुसैन मुड मुड़ के बेटी को देखते जाते थे और अली अकबर तो आंसुओं को कहीं सुग़रा देख ना ले इसलिए मुड़ भी नहीं रहे थे । जब काफिला नज़रों से दूर हो गया और इमाम को सुग़रा के लिए देख सकता मुमकिन ना था बस हुसैन आंसुओं से रो पड़े उधर अली अकबर के आंसू बने लगे और बेटी को अलविदा कहा । िस्ञ्ा आसान नहीं होता बाप के लिए बेटी को छोड़ के जाना ।
दिन बीते महीने बीते जनाब ऐ सुग़रा उम्मुल बनीन के पास आती जाती रहती थी फिर रमज़ान भी गया ऐ मुहर्रम आ गया । एक दिन सुग़रा को रात में प्यास लगी और उसने पानी पीना चाह की पानी में कुछ देखा और चिल्ला के उम्मे सलमा की बाँहों में चली गयी । उम्मे सलमा ने पुछा क्या हुआ बीबी तो सुग़रा ने कहा नानी पानी में मुझे अली असग़र का चेहरा दिखा अपने दोनों हाथों से मेरे पास आना चाह रहा था लेकिन सूखे लबों पे ज़बान फेर के बोला " अल अतश या उक्ति फातिमा " ऐ बहन फातिमा मैं प्यासा हूँ ।
ये ९ मुहर्रम की रात थी ।
जनाब ऐ मुस्लिम
२८ रजब का चला काफिला ४ शाबान को मक्का पहुंचा । इस वक़्त तक इमाम हुसैन (अ. स ) ने अभी तक यह तय नहीं किया था की उन्हें किस तरफ जाना है बस यह सोंचा रहे थे की ज़िलहिज्जा के महीने में हज करने के बाद आगे कहाँ का सफर करना है तय किया जायगा ।
उधर इराक़ के शहर कूफा में लोगों को पता चला कि इमाम हुसैन (अ स ) के साथ क्या हुआ तो उन्हें भी फ़िक्र होने लगी की कूफा में क्या होगा क्यों की वहाँ के लोग वैसे ही मुआव्विया के सताए हुए थे और उन्हें इस बात की फ़िक्र भी रहा करती थी की हज़रत मुहम्मद स अ व के बताये और फैलाये इस्लाम को कही ये बातिल खलीफा इतना न बिगाड़ दें की आने वाले नसलें असल इस्लाम जो अमन और शांति का संदेश देता भुला दिया जाय । वहाँ के लोगों को एक ऐसे इमाम की ज़रुरत पेश आई जो दीन ऐ इलाही को बचा सके और उन्हें सही क़ुरआन की तफ़्सीर और अहादीस बता सके ।
ऐसे में कूफा वालों ने सुलेमान बिन सुराद के घर पे मीटिंग की और फैसला किया की इमाम हुसैन को कूफा खत लिख के बुलाया जाय । उन सभी के अपने क़ासिद के हाथों हज़ारों की तादात में खत लिखे और इमाम को यह कह के बुलाया की उनके पास कोई इमाम नहीं है । खत देखने के बाद इमाम हुसैन (अ स ) ने अपने भाई जनाब ऐ मुस्लिम को कूफा भेजा जिससे वहाँ के हालात मालूम हो सकें ।
मुसलम हज़रत अली (अ स ) के भाई अक़ील के बेटे थे और जब जनाब ऐ मुस्लिम कूफा की तैयारी करने लगे तो इमाम हुसैन ने जनाब ऐ मुस्लिम से कहा की तुम अकेले जाओगे तो शायद वहाँ का गवर्नर ये ना समझ ले की तुम जंग की नीयत से आ रहे हो इसलिए अपने दो बेटों मुहम्मद जो १० साल का था और इब्राहिम जो ८ साल का था, को अपने साथ ले जाओ जिस से लोगों को लगे की तुम्हारा जंग का इरादा नहीं है । इस तरह जब जनाब ऐ मुस्लिम कूफा की जानिब अपने दो बेटो को ले के चले तो एक बेटा अब्दुल्लाह और एक बेटी रुकैया इमाम हुसैन के साथ रह गए ।
सबसे जनाब ऐ मुस्लिम को सेहरा के एक सख्त सफर के लिए रुखसत किया । जनाब ऐ मुस्लिम जुलकाद के आखिरी दिनों में कूफा पहुंचे और वहाँ पे १८००० से ज़्यादा लोगों ने उनके हाथ पे बैयत कर ली । जनाब ऐ मुस्लिम ने इमाम हुसैन को खत लिखा की यहां १८००० से ज़्यादा लोगों ने उकी बैयत कर ली है इसलिए कूफ़े की तरफ रवाना हो जाएँ ।
इधर यह खबर यज़ीद तक भी पहुँची की जनाब ऐ मुस्लिम कूफा पहुँच चुके हैं और जल्द ही इमाम हुसैन भी आने वाले है । यज़ीद ने फौरन अपने एक ज़ालिम गवर्नर ओबेदुल्ला इब्ने ज़ियाद को हुक्म दिया की कूफा जाय और वहाँ के नरम दिल गवर्नर नुमान इब्ने बसीर को हटा दे और वहाँ के हालात को संभाले और मुस्लिम बिन अक़ील को जितनी जल्द हो सके क़त्ल कर दे ।
इब्ने ज़ियाद जैसे ही कूफा पहुंचा उसने ऐलान करवा दिया की जो कोई भी मुस्लिम का साथ देगा उसकी सजा मौत होगी और यह भी हुक्म दिया हो सके मुस्लिम को उनके हवाले किया जाय और कोई मुस्लिम को पनाह ना दे। इसी के साथ कूफा से बाहर जाने वाले सारे रस्ते बंद कर दिए गए ।
जनाब ऐ मुस्लिम अल मुख्तार के घर में उस वक़्त ठहरे हुए थे लेकिन खतरा देख के जनाब ऐ हानी ने उन्हें अपने घर बुला लिया । लेकिन इब्ने ज़ियाद को इसकी खबर लग गयी और उसने जनाब ऐ हानी को बुला भेजा और मुस्लिम का पता ना बताने में उन्हें ज़ख़्मी कर के क़ैद कर दिया । जनाब ऐ मुस्लिम से सोंचा क्यों जनाब ऐ हानी के घर वालो को कोई नुकसान इब्ने ज़ियाद की तरफ से पहुंचे और घर अपने दोनों बच्चो के साथ वहाँ से निकल गए । अपने दोनों बच्चों को वहाँ के क़ाज़ी के घर पे छोड़ा और खुद निकल गए सेहरा की तरफ इस कोशिश के लिए की इमाम हुसैन से मना कर दें की वो कूफा ना आएं क्यों की िंबे ज़ियाद के खौफ से बैयत करने वालों ने बैयत छोड़ दी है ।
ये ७ ज़िलहिज्जा थी जब जनाब ऐ मुस्लिम ने पूरी कोशिश कर ली कूफा से बाहर जाने की लेकिन सभी रास्ते बंद होने की वजह से थक के बैठ गए । ८ ज़िलहिज्जा को जनाब ऐ मुस्लिम ने एक घर के बाहर दस्तक दी तो तुआ नाम की एक साहिबा से दरवाज़ा खोला जनाब ऐ मुस्लिम ने पानी माँगा उसके बाद पुछा कौन है मुसाफिर और जब मुस्लिम ने बताया की वो मुस्लिम बिन अक़ील हैं तो उन्हें अपने घर में बुला लिया और उन्हें खिला पिला के घर के एक कोने में सोने का इंतज़ाम कर दिया ।
देर रात उस औरत का बेटा घर आया और जब उसे पता चला की ये वो शख्स है जिसकी तलाश में इब्ने ज़ियाद है तो दौलत और इनाम पाने की लालच में इब्ने ज़ियाद को खबर कर दी । सुबह होते ही इब्ने ज़ियाद के ५०० से ज़्यादा सिपाहियों ने उस घर को घेर लिए । जनाब ऐ मुस्लिम बहादुर थे और उन्होंने ३ बार फ़ौज को पीछे भगाया और इब्ने ज़ियाद फ़ौज में सिपाही बढ़ाता गया । फिर भी जब वो मुस्लिम को क़ैद ना कर सके तो उन्हने मैदान में गढ्डे खुदवा के उसे घास से धक दिया और कुछ को ऊचाई से बिठा दिया की वहाँ से पथ्थर मारे और जनाब ऐ मुस्लिम ज़ख़्मी और ढके हारे एक गढ्ढे में फँस गए ।
जनाब ऐ मुस्लिम को ५० सिपाहयो ने क़ैद कर लिया और ज़ंजीरों में बाँध के इब्ने ज़ियाद के पास ले गए । इब्ने ज़ियाद ने कहा की अब तुम्हारी मौत सामने है अगर कोई वसीयत हो तो बताओ । जनाब ऐ मुस्लिम ने कहा मैंने कुछ क़र्ज़ लिया है जिसे मेरी तलवार बेच के अदा कर देना । दुसरे मेरे क़ब्र में मुझे शरीयत के मुताबिक़ दफन किया जाय और तीसरे इमाम हुसैन को कूफा आने से मना कर दिया जाय । इब्ने ज़ियाद ने पहली वसीयत तो मानी लेकिन बाक़ी से इंकार कर दिया ।
जनाब ऐ मुस्लिम को दारुल अमारा की छत पे ले जाय गया जहां उनका सर क़लम करने के बाद उनके जिस्म को वहीं से नीचे फैंक दिया गया । यह ९ ज़िलहिज्जा थी और जनाब ऐ मुस्लिम की शहादत के फ़ौरन बाद जनाब ऐ हानी को भी वैसे ही शहीद कर दिया गया ।
और इसी के साथ साथ इमाम हुसैन का पहला सफर ख़त्म हुआ और दूसरा मक्का से कर्बला का सफर शुरू हुआ ।
जब इब्ने ज़ियाद जनाब ऐ मुस्लिम को क़त्ल कर चूका तो उसने अपने फौजियों को मक्का भेजा की वहाँ जा के हज के मौके पे इमाम हुसैन को क़त्ल कर दे । उधर जनाब ऐ अब्दुल्ला अपने बेटो और और मुहम्मद के साथ हज के लिए मक्का पहुंचे और इमाम से मिले । जब इमाम ने बताय की वो कूफा जा रहे हैं तो अब्दुल्लाह ने मना किया लेकिन इमाम ने कहा जाना ज़रूरी है क्यों की १८००० लोगों ने उन्हें बुलाया है । जब इमाम नहीं माने तो अब्दुल्लाह ने कहा मेरे दोनों बेटो औंन और मुहम्मद को ले जाएँ और एक ज़ैनब की तरफ से और दूसरा मेरी तरफ से आप पे क़ुर्बान होगा ।
इमाम हुसैन को एहसास हो गया की मक्का में दुश्मन उनका खून बहा सकता है और इमाम ने ८ ज़िलहिज्जा को हज को उमरा में बदला और कूफ़े के लिए रवाना हो चले । यह वही दिन था जब जनाब ऐ मुस्लिम कूफ़े में शहीद हुए ।
ये कारवां जो कूफ़े की तरफ बढ़ चला था इसके अलमदार थे हज़रत अब्बास जो अलम लिए सबसे आगे थे और उनके साथ अपने असहाब के साथ इमाम हुसैन चल रहे थे । उसके पीछे थीं ऊंटों पे महमिलें जिसमे ख्वातीने सवार थीं । जनाब ऐ अली कबर, क़ासिम ऑन और मुहम्मद पीछे उन सबकी हिफाज़त के लिए एक घेरा बना के चल रहे थे ।
हज़रत अब्बास अलमदार का यह अंदाज़ था की कभी कभी ऊंचाई पे जाते और सारे सवार का जायज़ा लेते की किसी को कोई परेशानी तो नहीं और सबसे ज़्यादा तो अपनी चहेती भतीजी सकीना की फ़िक्र रहती की कहीं वो प्यासी तो नहीं । इस सफर में साथ ५० से ज़्यादा बच्चे थे लेकिन चाचा अब्बास की चहेती थी सकीना । जब भी किसी बची को कोई भी ज़रुरत होती तो सकीना से कहता और सकीना चाचा अब्बास से कह के उसकी ज़रुरत को फ़ौरन पूरा करवा देती थी ।
कारवां नमाज़ ऐ ज़ुहर के वक़्त एक मक़ाम अल थलबिया पहुंचा जो इस सफर का छटा मक़ाम था । यहां रात में ठहरने का फैसला किया गया और खाने का इंतज़ाम बाद नमाज़ किया जाने लगा । जब खाना पक गया तो इमाम ने वहाँ दो मुसाफिर भी थे उनको भी बुलाया खाने पे और पुछा क्या कूफ़े का कुछ हाल पता है ? उन्होने बताया की कूफा इब्ने ज़ियाद के हाथ में है और वहाँ ज़ुल्म का बोलबाला है । जब इमाम ने जनाब ऐ मुस्लिम के बारे में पुछा तो मुसाफिरों के आँख से आंसू बहने लगे और उन्होने मुस्लिम की शहादत की खबर दी । इमाम हुसैन ने अब्बास से कहा इन मेहमानो का ख्याल रखे और जनाब ऐ ज़ैनब के पास जा के कहा बहन तुम्हारी ज़िम्मेदारियाँ अब शुरू हो गयी है जनाब ऐ मुस्लिम शहीद हुए उनकी बीवी रुक़ैय्या अब तुम्हारे हवाले है । और इमाम ने जनाब ऐ मुस्लिम की बेटी को बुलवाया और उसके सर पे हाथ फेरने लगे । वो समझ गयी की बाबा अब दुनिया में नहीं रहे ।
क़ैस इब्ने मुशीर
क़ैस इब्ने मुशीर जो इस मक़ाम पे ठहरने से पहले कूफ़े की तरफ रवाना हो चुके थे इस ख्याल से की वहाँ पहुँच के जनाब ऐ मस्लिम के साथ मिला के इमाम हुसैन का इंतेख़बाल करेंगे और इमाम के साथ कूफ़े में दाखिल होंगे । ये जब कूफ़े के पास पहुंचे तो वहाँ लगी फ़ौज देख के समझ गए मामला कुछ गड़बड़ है और रात होते ही खबरें लेने लगे और यह एहसास हो गया जनाब ऐ मुस्लिम मुसीबत में हैं । वापस इमाम हुसैन (अ.स ) के पास जाने के उन्होंने फैसला किया रात के अँधेरे में कूफा जाय जाय और मुस्लिम की मदद करें लेकिन अफ़सोस क़ैस इब्ने मुशीर पकडे गए और इब्ने ज़ियाद के पास ले जाय गए । बने ज़ियाद ने कहा की वो अगर मिम्बर से बैठ के इमाम हुसैन को बुरा भला कहे तो उसकी जान बक्श देगा । क़ैस इब्ने मुशीर मिम्बर पे जा बैठे और वहाँ से इमाम हुसैन की शान में बातें लोगो को बतायी और यज़ीद ,इब्ने ज़ियाद को बुरा भला कहा । इब्ने ज़ियाद को गुस्सा आया और उसने क़ैस इब्ने मुशीर को शहीद करवा दिया ।
क़ैस ने आखिरी सलाम मौला हुसैन को भेजा और दुनिया से रुखसत हुए }
जनाब ऐ मुस्लिम के दोनों बेटे मुहम्मद और इब्राहिम ।
जब जनाब ऐ मुस्लिम शहीद कर दिए गए तो उनके दोनों बेटो मुहम्मद और इब्राहिम को भी कैदी बना लिया गया । २० ज़िलहिज्जा को जब जेलर उनको खाना देने आया तो उसने देखा दोनों नमाज़ अदा कर रहे हैं । नमाज़ ख़त्म होने के बाद उस जेलर ने उन बच्चों से पुछा की वो कौन हैं और जब उसे पता चला की ये मुस्लिम के बच्चे हैं तो उसने उन दोनों को रिहा कर दिया । दोनों ने रिहा होते ही सबसे पहले सोंचा की चलो कूफा से बाहर जाते हैं और इमाम हुसैन को यहां आने से रोक देते हैं लेकिन इतना सख्त पहरा था की दोनों जा ही नहीं सके और सुबह होने का वक़्त आ गया । दोनों ने आस पास देखा और खुद को नहर ऐ फुरात के किनारे पाया । दोनों ने पानी फुरात से पीया और इस डर से की कोई देख ना ले एक पेड़ पे चढ़ गए और इंतज़ार करने लगे रात होने का । इतने में एक औरत पानी भरने फुरात पे आई और उसने छुपे हुए बच्चों को देखा फिर बच्चो को बोली मैं जिनकी खादिम हूँ वो बहुत ही नेक औरत है चलो मेरे साथ वो तुम्हारी मदद ज़रूर करेगी ।
जब बच्चे उसके घर पहुंचे और उसे पता चला की ये कौन बच्चे हैं तो वो घबरा गयी क्यों की उसका शौहर हारीत इब्ने ज़्याद के लिए काम करता था जो ख़ुशक़िस्मती से घर पे नहीं था । बच्चे सो गए लेकिन रात को अचानक मुहम्मद उठ गया और रोने लगा । जब इब्राहिम ने वजह पूछी तो उसने बताया बाबा ख्वाब में आये थे इतना सून्नना था की इब्राहिम ने बताया की उसने भी बाबा को देखा है और कह रहे थे की जल्द ही तुम दोनों मेरे साथ होगे ।
मुहम्मद का रोना सुन के हारीत जो घर आ चूका था उन बच्चों के पास पहुंच गया और जब उसे पता चला की यह मुस्लिम के बच्चे हैं तो उनको खम्बे से बाँध दिया इस लालच में की इब्ने ज़ियाद से इनाम पाएगा । उसकी बीवी ने जब मना किया तो उसे भी मारा पीटा ।
रात भर बच्चे खम्बे से बंधे रहे और सुबह होते ही उन दोनों को फुरात के किनारे ले गया और तलवार निकाल ली । इब्राहिम ने पुछा क्या तुम हम दोनों को मारने जा रहे हो ? हारीत ने कहा हाँ । बच्चों ने नमाज़ ऐ सुबह की इजाज़त मांगी । बच्चों ने अल्लाह से दुआ मांगी की उनका इन्साफ करना और उनकी मान को सब्र देना बस इतना ही दुआ मांग सके थे की तलवार चली और दोनों शहीद हो गए और उनका लाश एक दुसरे को पकडे नहर ऐ फुरात में बह गयी गयी ।
क्रमश आगे कर्बला के शहीद । ....


