इसमें कोई शक नहीं की अज़ादारी को रोकने या इस इबादत को मकसद से भटकाने की साज़िश हमेशा से होती रही ...
इसमें कोई शक नहीं की अज़ादारी को रोकने या इस इबादत को मकसद से भटकाने की साज़िश हमेशा से होती रही है |
अज़ादारी नाम हैं ग़म ऐ हुसैन का, कर्बला के शहीदों पे आंसू बहाने का , उनके ग़म को दुनिया के सामने बयान करने के लिए नौहा , मजलिस करने का , हुसैन (अ.स) के ग़म में मातम करने का |
ये काम क़त्ल ऐ हुसैन (अ.स) के बाद जनाब ऐ जैनब ने इमाम हुसैन (अ.स) के लाशें पे बैठ की शुरू किया फिर कूफा में लोगों से मुखातिब हो के बयाना किया , फिर दरबार ऐ यजीद में बयान किया फिर जब रिहा हुए सब तो एहतेमाम के साथ लोगों को बुला के ग़म ऐ हुसैन में गिरया नौहा और मातम किया और लोगों को बताया कौन मारा गया , मकसद क्या था हुसैन (अ.स) का |
इसी को अज़ादारी कहते हैं जिसके लिए लोग कर्बला नजफ़ जाते हैं और जो नहीं जा पाते वो शबीह रौज़े की बना के नौहा मजलिस और मातम करते है |
इमाम हुसैन (अ.स) कौन थे और इनका मकसद ऐ शहादत क्या था इसी हर कौम तक पहुँचाना हमारा फ़रीज़ा है और इसी मकसद के लिए इमामबारगाह बनाये गए जहां हर कौम को आने की इजाज़त है लेकिन अब लोग अपनी मन्नत मुरादों के पूरे होने और मांगने ,सवाब कमाने के चक्कर में अज़ादारी को अपनी ज़रूरतों के मुताबिक ही अंजाम देने लगे हैं इसे औरों तक पहुँचाया भी जाय यह भुला दिया है जिसके ज्यादा ज़िम्मेदार हमारे जाकिर हैं |
जुलुस ऐ अज़ादारी दो चार सौ साल से शुरू हुयी जो आज तक चल रही है | यह तबलीग का सबसे बेहतरीन तरीका है जिसका इस्तेमाल हम सही तरीके से आज नहीं कर पा रहे हैं | इस अज़ादारी को रोकने और इसे मकसद से भटकाने की कोशिश आज भी हुआ करती है जिसे रोकना हम सब का फ़रीज़ा है और यह मुमकिन है सिर्फ उस वक़्त है जब हम यह समझ जायेंगे की अज़ादारी नाम है ग़म ऐ हुसैन का, कर्बला के शहीदों पे आंसू बहाने का , उनके ग़म को दुनिया के सामने बयान करने के लिए नौहा , मजलिस करने का , हुसैन (अ.स) के ग़म में मातम करने का |
अज़ादारी नाम है इमाम हुसैन (अ.स) की आवाज़ "हल मिन नसीरीन यनसुरना " की आवाज़ पे लब्बैक सिर्फ ज़बान से नहीं अमल से कहने का |
माह ऐ मुहर्रम में अज़ादारी सिर्फ यह बताती है की यही महिना था जब नेकी को फैलाने और बुराई से रोकने के लिए कर्बला में इमाम हुसैन (अ.स) से अपना भरा घर अपने असहाब कुरबान कर दिए जिस दिन हम ऐसे अज़ादार बन सके की अज़ादार पूरे साल अपने हुसैनी किरदार से पहचाना जाने लगे उस दिन समझिएगा हम आप सही मायने में हुसैन के अज़ादार हैं , हम सही मायने में इमाम हुसैन के मकसद नेकी फैलाओ और बुराई से रोकने को आगे बढ़ा रहे हैं | अज़ादारी सिर्फ आशूरा के रोज़ खून डोनेट करने का नाम नहीं बल्कि पूरे साल ज़रुरत मंदों को खून देने का नाम है |
एस एम् मासूम



