सरयू नदी राम घाट पे ताजिया प्रवाहित
मुहर्रम का चाँद होते ही पूरे देश में हर चौक इमामबाड़ों और घरों में इमाम हुसैन को श्रद्धांजलि देने के लिए उनकी शहादत को याद करने के लिए ताज़िया रखा जाता है | ताज़िया क्या है इसे समझने के लिए इस बात समझना आवश्यक है की मुहर्रम का चाँद होते ही हर हुसैन का चाहने वाला कर्बला इमाम हुसैन जहाँ दफन हैं वहां जाना चाहता है और जब वो नहीं जा पाता तो वो जहाँ रहता है वहीँ पे इमाम हुसैन के रौज़े की नक़ल बना के चौक और इमामबाड़ों में रखता है और इमाम हुसैन हुसैन की शहादत को याद करता है |
ताज़िये के अंदर इमाम हुसैन की क़ब्र बनी होती है और यह ताज़िया मुहर्रम का चाँद होते ही रखा जाता है और दस मुहर्रम को अपने अपने इलाक़े की कर्बला में वैसे ही दफ़्न कर दिया जाता है जैसे की घरों से किसी अपने को उसके इंतेक़ाल के बाद दफन किया जाता है |
यह ताज़ियादारी हर मुसलमान करता है और ताज़िये का अकार इलाक़ाई लोगों की पसंद के अनुसार हुआ करता है | ताजियादारी हकीकत में कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि देने का एक तरीका है और ताज़िया इमाम हुसैन की क़ब्र और रौज़े की नक़ल |
ताज़िये के अंदर इमाम हुसैन की क़ब्र बनी होती है और यह ताज़िया मुहर्रम का चाँद होते ही रखा जाता है और दस मुहर्रम को अपने अपने इलाक़े की कर्बला में वैसे ही दफ़्न कर दिया जाता है जैसे की घरों से किसी अपने को उसके इंतेक़ाल के बाद दफन किया जाता है |
यह ताज़ियादारी हर मुसलमान करता है और ताज़िये का अकार इलाक़ाई लोगों की पसंद के अनुसार हुआ करता है | ताजियादारी हकीकत में कर्बला के शहीदों को श्रद्धांजलि देने का एक तरीका है और ताज़िया इमाम हुसैन की क़ब्र और रौज़े की नक़ल |
ताज़िया जब रखा गया तो इसे दफन भी किया जाता है लेकिन यह ताज़िया दफन करने का तरीक़ा इलाक़ाई दस्तूरों के हिसाब से अलग हुआ करता है | जैसे जौनपुर में कुछ बड़े किये जाते हैं जैसे चेहल्लुम का इस्लाम के चौक से उठा ताज़िया लेकिन छोटे ताज़िये जो चौक पे रखे जाते हैं आशूरा १० मुहर्रम को ठन्डे कर दिए जाते हैं | अस्ल में ताज़ियों को सदर इमामबाड़े में एक जगह जमा कर दिया जाता है और उसके बाद उसपे पानी डाल दिया जाता है इसीको ताज़िया ठंडा करना बोलते है |
अज़ादारी ऐ हुसैन के अपने अपने अंदाज़ हैं जिनमे अयोध्या का ५०० से अधिक वर्ष पुराना अंदाज़ एक दम नया है | यहाँ दस मुहर्रम आशूरा के रोज़ लोग अपने अपने ताजिये कर्बला में दफन करने की जगह सरयू नदी के राम घाट पे नौहा मातम करते ले जाते हैं और वहीँ नदी में प्रवाहित कर देते हैं |यह जुलूस अंजुमन ऐ तरक्की ऐ अजा की तरफ से शुरू होता है |
https://www.jaunpurazadari.com/2017/10/blog-post_23.html


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