अवध में अज़ादारी का इतिहास मुगलों के समय से मिलता है | मुग़लों ने अपने एक तजुर्बेकार सिपाह सालार सय्यद मुहम्मद अमीन मूसवी को सआदत खां का खिता...
अवध में अज़ादारी का इतिहास मुगलों के समय से मिलता है |
मुग़लों ने अपने एक तजुर्बेकार सिपाह सालार सय्यद मुहम्मद अमीन मूसवी को सआदत खां का खिताब दे के हिंदुस्तान भेजा और अवध का सूबेदार बना दिया | बाद में इनको बुरहानुल मुल्क का खिताब दिया गया | सआदत खां इमाम मूसा ऐ काज़िम (अ ) की नस्ल थे और शिया थे | मुहर्रम का चाँद होते ही इनके घरों की औरतें काले कपडे पहन लेती थीं और चूड़ियां जेवरात उतार देती थी | मुहर्रम माह की ७ तारिख से अवध इलाके में राजकीय अवकाश हुआ करता था और इस मुहर्रम में हिंदी मुस्लिम सभी मिल के शरीक़ हुआ करते थे | ऐसा कहा जाता है की आज जो मुहर्रम का तरीक़ा है जुलुस निकालने का यह नवाबों के दौर में अवध फैज़ाबाद की सर ज़मीन से मशहूर हुआ |
फैज़ाबाद में ताज़ियादारी उस समय शुरू हुयी जब 1764 ई में शुजाउद्दौला की माँ सदरुनन्निसा ने मोती बाग के क़रीब एक इमामबाड़ा तामील करवाया | यह इमामबाड़ा आज भी गुलबवादी के मुख्य द्वार के दाहिनी तरफ मौजूद है | उसी वक़्त से जुलुस ऐ अज़ादारी में अलम हज़रत अब्बास ,ताज़िया ,दुलदुल ,ताबूत झूला ,ज़री ,अमारी ,महमिल या कजावा शमिल किया जाने लगा |
अज़ादारी के जुलुस की यह भव्यता सदरुनन्निसा फैज़ाबाद से निकल के लखनऊ के आसिफुद्दौला के दरबार तक गयी | उसी दौर से यह चलन में आया की मुहर्रम में औरतें ज़ेवर नहीं पहनती, चूड़ियां तोड़ देती हैं, लड्डू सिंवइयाँ इत्यादि ख़ुशी की प्रतीक मिठाइयां नहीं बनायी जाती | यहां तक की नवाबों के यहां शुभ समझी जाने वाली मछली भी नहीं पकाई जाती | इमाम हुसैन की शहादत के ग़म में अपनी हर ख़ुशी को त्याग देने का चलन था उस समय जो आज भी क़ायम है |
फैज़ाबाद में मुहर्रम का पहला जुलुस हर वर्ष शुरू होने के एक दिन पहले २९ जिलहिज्ज को चौक की वक़्फ़ हसन खां की मस्जिद से उठा के राठ हवेली के वक़्फ़ काज़िम हुसैन के इमामबाड़े तक जाता है | यह फैज़ाबाद का सबसे पुराना लगभग १०० वर्ष का जुलुस है | इस जुलुस की सबसे बड़ी खासियत यह है की इसमें जंगी तबल वगैरह बजते है जिसकी आवाज़ से यह माहौल बन जाता है की अब मुहर्रम शुरू हो गया |
अयोध्या और फैज़ाबाद के बीच बड़ी बुआ की कर्बला है जहां अहले सुन्नत वाल जमात के लोग और कुछ शिया भी ताज़िया १० मुहर्रम को दफन करते हैं | |
अट्ठारवीं शताब्दी से ही फैज़ाबाद में मातमी अंजुमन बनने का सिलसिला शुरू हो गया था जिनमे से मुख्य हैं अंजुमन ऐ हुसैनिया वज़ीर गंज और हैदर गंज | चेहल्लुम का शाही जुलुस खजूर की मस्जिद से चौक की मस्जिद तक यही अंजुमन के के जाती है |
दुसरी अंजुमन है जो अट्ठारवीं शताब्दी की है वो है अंजुमन ऐ नसीरया अंगूरी बाग़ ,चौक और नहर बाग़ यह अंजुमन चेहल्लुम की रात में वज़ीर गंज बड़ी दरगाह से जुलुस चौक तक लाती है |
इसी प्रकार उन्नीसवीं शताब्दी की अंजुमन ऐ अबिदिया इमामबाड़ा राठ हवेली ,अंजुमन ऐ मसुमियाँ राठ हवेली है |
अंजुमन ऐ मासूमीयां की खास बात यह है की इसमें सभी धर्म के लोग जुड़े हैं जैसे हरिश्चंद्र शर्मा ने दस साल इसमें नौहा पढ़ा ,तीस साल तक स्वर्गीय ईश्वर चद्र शर्मा ने नौहा पढ़ा , बेटे विक्रम शर्मा ने यह काम अपने हाथ में लिया | इसके एक मशहूर नौहे के लक्ज़ कुछ ऐसे हैं |
ऐ शामियों में शेर ऐ इलाही का शेर हूँ
अब्बास मेरा नाम है मैं वो दिलेर हूँ |
ऐसे ही बज़्म ऐ अब्बासिया मोती मस्जिद ,अंजुमन ऐ गुंचा ऐ मज़लूमिया ,ख्वास पूरा ,वगैरह ख़ास है |
( जिन अंजुमन का नाम छूट गया हो वो कृपया सूचित करें | )
लेखक एस एम् मासूम

गहवारा अली असग़र





