रौज़ा इमाम हुसैन (अ ) पे कर्बला में लाल परचम क्यों हो जाता है काला ? कर्बला में नवासा ऐ रसूल इमाम हुसैन (अ ) के रौज़े पे हमेशा एक लाल परचम लहर...
रौज़ा इमाम हुसैन (अ ) पे कर्बला में लाल परचम क्यों हो जाता है काला ?
कर्बला में नवासा ऐ रसूल इमाम हुसैन (अ ) के रौज़े पे हमेशा एक लाल परचम लहराता रहता है जिसके बारे में कहा जाता है कि 61 हिजरी (680 ) में इमाम की शहादत के बाद जब रौज़ा बना तब से यह परचम लहरा रहा है | इसके लाल रंग के बारे में कहा जाता है की कर्बला में इमाम हुसैन अलैहिसलाम की शहादत के बाद उनके परिवार की औरतों बच्चों को क़ैदी बना लिया गया लेकिन यह हक़ और बातिल की जंग ख़त्म नहीं हुयी है और एक दिन इसका फैसला होना है |

यह लाल परचम लहराता हुआ यह ऐलान कर रहा है की हक़ और बातिल की जो जंग इमाम हुसैन और यज़ीदियों के बीच हुयी थी वो आज भी जारी है और हमारा सर किसी भी ज़ालिम के आगे नहीं झुकेगा | यह जंग आज भी इमाम हुसैन के चाहने वाले इंसानियत का पैग़ाम देते हुए ज़ुल्म के खिलाफ लड़ रहे हैं और इंतज़ार में हैं की उनका इमाम ऐ वक़्त आएगा और कर्बला का फैसला होगा , हक़ का परचम लहराएगा ,ज़ुल्म का दुनिया से खात्मा होगा |
माह ऐ मुहर्रम का चाँद नमूदार होते ही इस लाल रंग के परचम को उतार के काले रंग का मार्चम लगा दिया जाता है जो ऐलान करता है की यह वो महीना है जिसमे इमाम हुसैन अलैहिसलाम की शहादत हुयी थी और हम सभी इमाम के चाहने वाले उनका ग़म मना रहे हैं | यह काला परचम ग़म का इज़हार करता है |
इराक़ में माह ऐ मुहर्रम का चाँद होते ही लोग इमाम हुसैन अलैहिसलाम के रौज़े के पास जमा हो जाते हैं और शाही तरीके से लब्बैक या हुसैन के नारों के साथ इस लाल परचम को काले रंग के परचम से बदला जाता है और इमाम के चाहने वाले आँखों में आंसू लिए मातम करते हैं |


