61 AH (10 October 680 AD) के दिन इराक़ के एक सुनसान इलाक़े कर्बला में पैगम्बर ऐ इस्लाम हज़रत मुहम्मद के नवासे इमाम हुसैन को उनके परिवार वालों क...

इस बयान में सबसे पहले जाकिर एक खुतबा अरबी में पढता है जिसका सारांश यह होता है की शुरू करता हूँ अल्लाह के नाम पे और सारी तारीफ़ उस खुदा के लिए है दुरूद और सलाम मुहम्मद व आले मुहम्मद के लिए और उसके साथ कुरान की कोई आयात या हदीस पढता है जिस से जोड़ के वो अपनी खिताबत पूरा करता है |
इस खिताबत में बाद खुतबे के अह्लेबय्त की अहमियत उनकी फजीलतें , दीनयात इत्यादि बयान होते हैं जिसे "फजायेल " कहा जाता है और फिर उसके बाद अल्लाह की राह में क़ुरबानी देने वालों पे हुए ज़ुल्म को उनके दुखों को बयान किया जाता है जिसे "मसाएब " कहते हैं | यह बयान उर्दूभाषा में और अरबी में कुरान और हदीस के सहारे दिया जाता है |
मसाएब के बाद सभी मोमिनीन आँखों में आंसू लिए नौहा और मातम किया करते हैं या जुलूस निकलते हैं और अंत में यह मानते हुए की इस मजालिस में इमाम (अ.स) आये हुए हैं जियारत पढी जाती है |
मजालिस का यह अंदाज़ आजे से तकीबन १०० साल पहले नहीं था बल्कि उस समाज सोअज़ ख्वानी , मर्सिया इत्यादी अरबी , फारसी या मेरे अनीस के उर्दू और फारसी में लिखे मर्सिये हुआ करते थे | भारत वर्ष में भी मीर अनीस और मेरे दबीर का मजालिसों में बोलबाला था और मजालिसें कम लेकिन बड़े पैमाने पे हुआ करती थीं और उसके लिए बड़े बड़े इमामबाड़ों का इस्तेमाल हुआ करता था | आज मजालिसों की तादात में बहुत ज्यादा इजाफा हुआ है और आज ये घर घर हुआ करती हैं और इमामबाड़ों का इस्तेमाल बड़ी बड़ी मजालिसों के लिए आज भी किया जाता है | आज केवल मजलिस ही अधिक नहीं हुयी बल्कि इसके ज़ाकिर के नाम पे अब किसी भी अच्छे वक्ता को बिठा दिया जाने लगा है बिना यह सोंचे की इसकी इस्लामिक विषयों की जानकारी है भी या नहीं और नतीजे में नौजवान गुमराह हो रहा है |
यह बहुत कम लोग जानते हैं की आज यह जो मजलिसों का अंदाज़ है जिसमे "खुतबा , फ़ज़ायल और मसाएब " हुआ करते हैं इसे मजलिसों के अंदाज़ में शामिल करने वाले मरहूम मौलाना सय्यद सिपते हसन नकवी हैं जो जायस के रहने वाले थे |मरहूम इमामबाड़ा (गुफरान माब में दफन हुए |
..एस एम मासूम


