वैसे तो दुनिया का अधिकतर मुसलमान शब् ऐ आशूर रात भर अपने घरों या चौक पे ताज़िया रख के हुसैन को याद करते हैं और कर्बला के शहीदों को रात भर जाग ...
वैसे तो दुनिया का अधिकतर मुसलमान शब् ऐ आशूर रात भर अपने घरों या चौक पे ताज़िया रख के हुसैन को याद करते हैं और कर्बला के शहीदों को रात भर जाग के याद करते हैं और दस मुहर्रम को रोज़ा रखते हैं ,जगह जगह हुसैन की याद में लोगों को जमा करके कर्बला के शहीदों पे हुए ज़ुल्म को लोगों को बताते हैं | लेकिन शिया मुसलमान जो नवासा ऐ पैग़म्बर ऐ इस्लाम को तीसरा इमाम मानता है उसका मुहर्रम का चाँद होते ही ग़म मानाने का अंदाज़ अलग है |



मुहर्रम का चाँद होते ही शिया मुसलमान अपने घरों में इमामबाड़ों में अलम ताज़िया सजा लेता है और शोक सभाएं करने लगता है और हुसैन पे हुए ज़ुल्म को याद करके रोता मातम करता है | औरते चूडिया तोड़ देती हैं बनाव श्रृंगार बंद कर देती हैं और सभी शिया काले कपडे पहनने लगते हैं |
दस मुहर्रम को कर्बला में इमाम हुसैन को उनके परिवार वालों के साथ ज़ालिम यज़ीद की फ़ौज ने शहीद कर दिया ,औरतों को क़ैदी बना लिया और ज़ुल्म का एक लम्बा सील सिला चल पड़ा |
इसी दस मुहर्रम की शब् आते ही सभी शिया काले कपडे पहन लेते हैं , शाम से बनाव श्रृंगार नहीं करते ,बाल नहीं बनाते ,घरों में पालक का साग ,मसूर की दाल इत्यादि जिसे दुःख की निशानी कहा जाता है पकाते हैं | देखने से सभी दुखी दिखाई देते हैं | शाम होते ही नमाज़ें , इबादत शुरू कर देते हैं और कोशिश करते हैं की कर्बला में इमाम हुसैन के रौज़े तक जा सकें और जो नहीं जा पाते वे अपने इलाक़े के इमामबाड़ों , चौक पे रखे ताज़ियों की ज़ियारत करते हैं और मजलिसें किया करते हैं | रात में सोते नहीं फर्श पे बैठते हैं और घर की पलंग हटा दी जाती है जिससे ग़म ऐ हुसैन में आराम न करें |

karbala rauza imam husain and hazrat abbas alamdar
बहुत सी जगहों पे ख़ास तौर से औरतें सुबह होते ही मजलिस मातम करती हैं और भूसा उड़ाया जाता है जो कर्बला में इमाम हुसैन के खेमे लूटने का प्रतीक चिन्ह है और हाय हुसैन की सदायें बलन्द रहती हैं |
आशूरा की सुबह घरों में चूल्हा नहीं जलता , कोई खाना नहीं खाता , पानी नहीं पीता ,काले कपडे पहने आस्तीन चढ़ी , गला खुला , नंगे पैर ग़म ज़दा बस हाय की सदा के साथ हुसैन की याद में आंसू बहाता है , मजलिसें करता है अज़ादारी के जुलुस में शामिल होता है | पूरे दिन आपस में हाथ नहीं मिलाता बस हाय हुसैन हाय हुसैन कर्बला वालों को याद करके करता है | सुबह से १२ बजे तक इबादतों नमाज़ और अमाल में वक़्त गुज़रता है और उसके बाद से जो ताज़िये चौक पे ,इमामबाड़ों में मुहर्रम का चाँद होते ही या मुहर्रम की किसी भी तारिख में रखे गए थे उसे ले के अपने इलाक़े की कर्बला में जाता है और जैसे कोई किसी अपने का जनाज़ा ले जाता है वैसे ही आँखों में आंसू लिए या हुसैन की सदायें बलन्द करता दफन करता है |
photo julus muharram 2016 jaunpur
दफन करने के बाद शाम को खिचड़ी या खिचड़ा बनता है जिससे वो दिन भर का फ़ाक़ा ख़त्म करके खाता पीता है और फिर अपने घरों से नंगे पैर अपने इलाक़े की कर्बला जाता है जहां शाम ऐ ग़रीबा की मजलिस होती है और कर्बला में इमाम हुसैन की शहादत के बाद उनके घरों को कैसे लूटा , कैसे खेमे जलाय गए बता के रोता और मातम करता है और वापस घरों को आके इबादतों में लग जाता है |
यक़ीनन इस पूरे तरीके में अल्लाह की इबादतों नमाज़ों अमाल के साथ साथ सामाजिक तौर तरीके ग़म पेश करने के भी शामिल हैं और हर इलाक़े में अलग अलग तरीके से ग़म महसूस किया जाता है | लेकिन जो भी काम अंजाम दिया जाता है शरीयत की पाबन्दी के साथ अंजाम दिया जाता है |


