मीर बब्बर अली अनीस (१८०२-१८७४ ) अपनी मर्सिया गोई के लिए मशहूर मीर अनीस का जन्म १८०२ में फ़ैज़ाबाद के गुलाबवाड़ी मोहल्ले में हुआ जिसकी निशानी ...
मीर बब्बर अली अनीस (१८०२-१८७४ )
अपनी मर्सिया गोई के लिए मशहूर मीर अनीस का जन्म १८०२ में फ़ैज़ाबाद के गुलाबवाड़ी मोहल्ले में हुआ जिसकी निशानी वो मकान आज भी मौजूद है | बाद में अपने पिता मीर ख़ालिक़ के साथ वे लखनऊ जा के बस गए | पिता मीर ख़ालिक़ भी मर्सिया गो थे इसलिए उन्होंने अपने बच्चों को भी मर्सिया गोई का माहिर बना दिया | कहा जाता है की मीर अनीस अपने खानदान की पांचवीं नस्ल थे जिनके पास मर्सिया गोई का हुनर था | मीर अनीस को इस बात का बड़ा फख्र था की शब्बीर की मददाहि में वे पांचवीं नस्ल है | आश्चर्यजनक रूप से मीर अनीस का बहुत कम समय में इस फन के चमकते सितारों में शुमार होने लगा और उनकी जगह आज तक कोई न ले सका |
अपने जीवन के अंतिम दिनों में लखनऊ चौक की पुराई सब्ज़ी मंडी के पास चोबदारी में मकान खरीद के रहने लगे थे जहां १० दिसंबर १८७४ को उनका देहांत हो गया और घर के पीछे ही एक मैदान में उनको दफन किया गया |
उनके इंतेक़ाल के ९८ साल बाद उनकी क़ब्र को आलीशान तरीके से डॉ कल्बे सादिक़ साहब की कोशिशों की वजह से बनाया गया और भारत सरकार ने एक डाक टिकट भी उनकी तस्वीर के साथ उनकी याद में ज़ारी किया |
हमारे खानदान ज़ुलक़द्र बहादुर का मीर अनीस के घराने का सात नस्लों का गहरा ताल्लुक़ रहा है और हमारे जद सय्यद मुहम्मद मोहसिन , सय्यद नासिर अली मीर अनीस के शागिर्द रहे और आज भी हमारे यहाँ मीर अनीस के अंदाज़ में १८ सफर को मर्सिया पढ़ा जाता है |
लेखक एस एम् मासूम

मक़बरा मीर अनीस लखनऊ

डाक टिकट मीर अनीस की याद में
मीर अनीस का लखनऊ चौक का घर जहां उन्होंने आखिरी सांसें ली
वो जगह जहाँ मीर अनीस लेट के मर्सिया तैयार करते थे
मीर अनीस की क़लम और टोपी
मीर अनीस की क़लम से या हुसैन लिखते हुए लेखक एस एम् मासूम
मीर अनीस का खुद लिखा कलाम और असल तस्वीर
मीर अनीस की क़ब्र पे सूरा ऐ फातेहा पढ़ते हुए


