अज़ादारी जौनपुर का इतिहास |
अज़ादारी ऐ हुसैन (अ.स) को दो हिस्सों में बांटने पे पता लगता है की इसके पहले हिस्से में ज़िक्र ऐ हुसैन , मर्सिया, नौहा और मातम का शुमार है जिसकी शुरुआत कर्बला के बाद से ही हो गयी थी और पहली जाकिर जनाब ऐ जैनब खुद थीं |अज़ादारी के दुसरे हिस्से में जुलूस ऐ अजा , ताजियादारी, शब्बेदारी वगैरह का शुमार हुआ करता है|
शार्की बादशाहों ने जौनपुर में बहुत से इमामबाड़े ,रौज़े बनवाये जिसे देख के ऐसा लगता है की वो जौनपुर को बग़दाद की शक्ल देना चाहते थे और बहुत हद तक इसमें कामयाब भी थे | लेकिन इब्राहीम लोधी ने इसे तोड़ डाला और बहुत हद तक बर्बाद किया | फिर भी बहुत से रौज़े और इमामबाड़े आज भी बचे हुए हैं | ख़ास कर के जो शहर जौनपुर के अंदर हैं उनमे आज भी अज़ादारी बड़े जोर शोर और खुलूस के साथ हुआ करती है |
सदर इमाम बाड़ा , इस्लाम का चौक ,कल्लू का इमामबाडा ,अकबर का इमामबाड़ा ,इमामबाड़ा मीर घर, इमाम बाड़ा भुआ बीबी (दल्लान) ,इमाम बाड़ा ज़किया बीबी, इत्यादि सभी एक डेढ़ किलोमीटर के दायरे में बने हैं और सभी का शुमार क़दीमी इमामबाड़ों में किया जाता है | मुहर्रम और सफ़र के महीने में इन इमामबाड़ों में अज़ादारी ऐसे हुआ करती है जिसे देख कर्बला की याद आ जाती है |
जौनपुर में शिया ने अली का वजूद १४ वी सदी के पहले से या कह लें शार्की समय के पहले से मिलता | जब पहला शार्की सुलतान ख्वाजा जहां मालिक सर्वर का यहाँ आना हुआ | यह शार्की शिया ऐ अली थे | ref Husain, Muzaffar, 'History of Azadari of Muharram in Jaunpur, Allahabad, 1927, p. 9.
निकल कर खानकाहों से अदा कर रस्म ऐ शब्बीरी |
तू फ़क्र ऐ खानकाही है फ़क़त अंदोह ऐ दिलगीरी |
१३७१ AD में हजरत मौलाना मकदूम स्येद अली नसीर साहब ने जो मुहल्लाह नसीर खान ( छात्रिघात ) के रहने वाले थे माना जाता है की उन्होंने ने वहाँ पहला इमामबाडा जौनपुर का बनवाया | जो आज भी मौजूद हैं पहले इसकी हालत ठीक नहीं थी लेकिन अब उसे बनवा दिया गया है | यह पहला इमामबाड़ा जो छत्री घात का कहा जाता है उसमे इस बात के इमकानात भी हैं की यह सदर इमामबाड़ा ही रहा हो जिसका फाटक छत्री घाट से शुरू होता रहा हो |
दूसरा इमामबाडा फातिमा बीबी उर्फ़ बहवा बेगम ने बनवाया जिसे आज इमामबाडा दल्लान के नाम से जाना जाता है | इस इमामबाड़े को बनवाने के लिए शहजादा नसीरुद्दीन मुहम्मद तुगलक ने जगह दी थी | ref: IBID
आज भी ये इमामबाडा जिस इलाके में है उसके आस पास के इलाके का नाम बाज़ार भुआ है जो की हकीकत में बज़ात बहवा है |
फिरोजशाह तुगलक के 38 साल के शासनकाल के बाद वंशानुगत झगड़ों के कारण उसकी सल्तनत 1398 में तैमूर के हमले की शिकार हो गई, जिसके कारण दिल्ली में भारी तबाही हुई।
हिन्दुस्तान में बना पहला ताजिया दिल्ली में |हिन्दुस्तान में जब तैमूरलंग आया और जंग की वजह से मुहर्रम करने कर्बला नहीं जा सकता तो उसने कर्बला के रौज़े की शबीह बनवाई जो हिन्दुस्तान का पहला ताजिया कहलाया | यह वो दौर था जब तैमूर लंग ने दिल्ली पे हमला किया और महमूद शाह तुगलक से जंग की | यह 1398AD–1399 A.D. के बीच का दौर था जब पहला ताजिया हिन्दुस्तान में बनाया गया |
शार्की समय की अज़ादारी |
शार्की समय में अज़ादारी को बहुत आगे बढाया गया और शार्की शहजादे अज़ादारी पे ख़ास ध्यान दिया करते थे| लेकिन शार्की समय में अज़ादारी का मतलब होता था मर्सिया ख्वानी ,नौहा और मजलिस | जुलुस ऐ अज़ादारी ताजिया ,अलम ,तुरबत निकालने का दस्तूर नहीं था |

सुल्तान इब्राहीम शाह शार्की ने एक इमामबाड़ा बनवाया जिसे खानकाह नुहागरन का नाम दिया गया| कहा जाता है की ये इमामबाड़ा सुलतान इब्राहीम सुरी के कब्रिस्तान जहां वो खुद दफन हैं , से सटा हुआ है और पुराने समय में इब्राहीम शाह सुरी की वसीयत के मुआबिक उसकी कब्र में मुहर्रम में एक ताजिया रखा जाता था |
आखिरी शार्की सुलतान हुसैन शाह शार्की ने एक बड़ी मस्जिद जामी उश शर्क बनवाया जो वहाँ पहले से इब्राहीम शाह द्वारा बनवाये इमामबाड़े खानकाह नुहागरन को आगे बढाते हुए बनायी गयी | ref: Beg, Mirza Abbas Ali, 'Jaunpurnama', (Urdu), Husaini Mission, Lucknow, 1987, p. 87.
इब्राहीम शाह शार्की (१४००-१४४०) के बेटे महमूद शाह शार्की (१४४०-१४५७) ने बेगम गंज में एक बेहद खूबसूरत इमामबाडा बनवाया जिसे इब्राहीम लोधी (1517) ने तुडवा दिया था | आज इस इमामबाड़े को सदर इमामबाडा के नाम से जाना जाता है | ref: IBID pg 22
बीबी राजे जो सुलतान महमूद शार्की की पत्नी थी उन्होंने बेगम गंज में एक बड़ी मस्जिद बनवाई जिसे आज लाल दरवाज़ा के नाम से जाना जाता है और उसका ज़िम्मेदार हमारे जौनपुर में आये पहले जद जनाब सय्यिद अली दाऊद साहब को बना दिया | सय्यिद अली दाऊद की कब्र आज भी मुहम्मद हसन कॉलेज के पीछे च्त्रसारी से पहले सदल्ली पुर (स्य्यिद अली पुर) में मौजूद है |
फिर अकबर का दौर आया जब जौनपुर के गवर्नर मुनीम खान खान इ खाना ने कटघरा मोहल्ला में एक मस्जिद और 'खानकाह ऐ ज़िक्र अन' की तामील करवाई जो आज खंडहर में बदल चुका है | कटघरा मोहल्ला में ऐतिहासिक रौज़ा है जिसमे हजरत मुहम्मद (स.अव), हजरत अब्बास अलमदार , बीबी सकीना के रौज़े बने हुए हैं| किनारे एक पुरानी मस्जिद भी दिखती है को इसके ऐतिहासिक होने का सुबूत देती है | यहाँ पे एक चौक बना हुआ है जिसमे अलम ताज़ा के फूल बहाए जाते हैं और यह पूल गोमती नदी में चला जाता है | ऐसा चौक कहा जाता है की दुनिया में केवल दो हैं एक इरान में और दूसरा कटघरा जौनपुर में |
यह रौज़ा १५२७ में हुमायूँ के ज़माने का बना है लेकिन बार बार यह बाढ़ में नष्ट हो जाता था बाद में १७७४ में खानखाना ने इसे मुकम्मल करवाया |
सदर इमाम बाड़ा , इस्लाम का चौक ,कल्लू का इमामबाडा ,अकबर का इमामबाड़ा ,इमामबाड़ा मीर घर, इमाम बाड़ा भुआ बीबी (दल्लान) ,इमाम बाड़ा ज़किया बीबी, इत्यादि सभी एक डेढ़ किलोमीटर के दायरे में बने हैं और सभी का शुमार क़दीमी इमामबाड़ों में किया जाता है | मुहर्रम और सफ़र के महीने में इन इमामबाड़ों में अज़ादारी ऐसे हुआ करती है जिसे देख कर्बला की याद आ जाती है |
बहुत से इमामबाड़े इब्राहीम लोधी के समय में तोड़ दिए गए उनमे से जिसके निशाँ बाकी थे उन्हें फिर से बनवाया गया और बहुत से उसी दौर के इमामबाड़े वैसी ही हालत में हैं जो इब्राहीम लोधी नहीं तोड़ सका था |
आज जौनपुर का मरकज़ बेगम गंज का सदर इमामबाडा है जहां आशूर के रोज़ पूरे जौनपुर से दफन होने के लिए ताजिये आते हैं |
शार्की बादशाहों ने जौनपुर में बहुत से इमामबाड़े ,रौज़े बनवाये जिसे देख के ऐसा लगता है की वो जौनपुर को बग़दाद की शक्ल देना चाहते थे और बहुत हद तक इसमें कामयाब भी थे | लेकिन इब्राहीम लोधी ने इसे तोड़ डाला और बहुत हद तक बर्बाद किया | फिर भी बहुत से रौज़े और इमामबाड़े आज भी बचे हुए हैं | ख़ास कर के जो शहर जौनपुर के अंदर हैं उनमे आज भी अज़ादारी बड़े जोर शोर और खुलूस के साथ हुआ करती है |
सदर इमाम बाड़ा , इस्लाम का चौक ,कल्लू का इमामबाडा ,अकबर का इमामबाड़ा ,इमामबाड़ा मीर घर, इमाम बाड़ा भुआ बीबी (दल्लान) ,इमाम बाड़ा ज़किया बीबी, इत्यादि सभी एक डेढ़ किलोमीटर के दायरे में बने हैं और सभी का शुमार क़दीमी इमामबाड़ों में किया जाता है | मुहर्रम और सफ़र के महीने में इन इमामबाड़ों में अज़ादारी ऐसे हुआ करती है जिसे देख कर्बला की याद आ जाती है |
जौनपुर में शिया ने अली का वजूद १४ वी सदी के पहले से या कह लें शार्की समय के पहले से मिलता | जब पहला शार्की सुलतान ख्वाजा जहां मालिक सर्वर का यहाँ आना हुआ | यह शार्की शिया ऐ अली थे | ref Husain, Muzaffar, 'History of Azadari of Muharram in Jaunpur, Allahabad, 1927, p. 9.
चूँकि हम जैसे सय्यदों का जौनपुर में वजूद बीबी राजे जो सुलतान महमूद शाह शार्की की पत्नी थी उस के पहले से मिलता है मुझे इतना यकीन हैं की कम से कम शार्की समय में शिया जौनपुर में थे जो शार्की नस्ल से नहीं थे |
जौनपुर में शार्की समय में बहुत से इमामबाड़े बने मस्जिदें बनी और अज़ादारी कायम हुयी | इस अज़ादारी के नाम पे अल्लामा इकबाल का शेर याद आ गया |
तू फ़क्र ऐ खानकाही है फ़क़त अंदोह ऐ दिलगीरी |
जौनपुर में अज़ादारी १३६० में फ़िरोज़ शाह तुगलक के समय से ही हो चुकी थी जहां से जौनपुर में अज़ाखाने बनना शुरू हुए | फ़िरोज़ शाह तुगलक (1351-1388) के जौनपुर बसाने के साथ ही यहाँ अज़ादारी भी शुरू हो गयी थी और उस दौर में बहुत से इमाम बाड़े भी यहाँ बनाए गए |
१३७१ AD में हजरत मौलाना मकदूम स्येद अली नसीर साहब ने जो मुहल्लाह नसीर खान ( छात्रिघात ) के रहने वाले थे माना जाता है की उन्होंने ने वहाँ पहला इमामबाडा जौनपुर का बनवाया | जो आज भी मौजूद हैं पहले इसकी हालत ठीक नहीं थी लेकिन अब उसे बनवा दिया गया है | यह पहला इमामबाड़ा जो छत्री घात का कहा जाता है उसमे इस बात के इमकानात भी हैं की यह सदर इमामबाड़ा ही रहा हो जिसका फाटक छत्री घाट से शुरू होता रहा हो |
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| chattrighat ka imambada ander se . |
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| Chatrighat ka Imambada (pahla imambada jaunpur ka ) |
दूसरा इमामबाडा फातिमा बीबी उर्फ़ बहवा बेगम ने बनवाया जिसे आज इमामबाडा दल्लान के नाम से जाना जाता है | इस इमामबाड़े को बनवाने के लिए शहजादा नसीरुद्दीन मुहम्मद तुगलक ने जगह दी थी | ref: IBID
आज भी ये इमामबाडा जिस इलाके में है उसके आस पास के इलाके का नाम बाज़ार भुआ है जो की हकीकत में बज़ात बहवा है |
फिरोजशाह तुगलक के 38 साल के शासनकाल के बाद वंशानुगत झगड़ों के कारण उसकी सल्तनत 1398 में तैमूर के हमले की शिकार हो गई, जिसके कारण दिल्ली में भारी तबाही हुई।
हिन्दुस्तान में बना पहला ताजिया दिल्ली में |हिन्दुस्तान में जब तैमूरलंग आया और जंग की वजह से मुहर्रम करने कर्बला नहीं जा सकता तो उसने कर्बला के रौज़े की शबीह बनवाई जो हिन्दुस्तान का पहला ताजिया कहलाया | यह वो दौर था जब तैमूर लंग ने दिल्ली पे हमला किया और महमूद शाह तुगलक से जंग की | यह 1398AD–1399 A.D. के बीच का दौर था जब पहला ताजिया हिन्दुस्तान में बनाया गया |
शार्की समय की अज़ादारी |
शार्की समय में अज़ादारी को बहुत आगे बढाया गया और शार्की शहजादे अज़ादारी पे ख़ास ध्यान दिया करते थे| लेकिन शार्की समय में अज़ादारी का मतलब होता था मर्सिया ख्वानी ,नौहा और मजलिस | जुलुस ऐ अज़ादारी ताजिया ,अलम ,तुरबत निकालने का दस्तूर नहीं था |
सुल्तान इब्राहीम शाह शार्की ने एक इमामबाड़ा बनवाया जिसे खानकाह नुहागरन का नाम दिया गया| कहा जाता है की ये इमामबाड़ा सुलतान इब्राहीम सुरी के कब्रिस्तान जहां वो खुद दफन हैं , से सटा हुआ है और पुराने समय में इब्राहीम शाह सुरी की वसीयत के मुआबिक उसकी कब्र में मुहर्रम में एक ताजिया रखा जाता था |
आखिरी शार्की सुलतान हुसैन शाह शार्की ने एक बड़ी मस्जिद जामी उश शर्क बनवाया जो वहाँ पहले से इब्राहीम शाह द्वारा बनवाये इमामबाड़े खानकाह नुहागरन को आगे बढाते हुए बनायी गयी | ref: Beg, Mirza Abbas Ali, 'Jaunpurnama', (Urdu), Husaini Mission, Lucknow, 1987, p. 87.
इब्राहीम शाह शार्की (१४००-१४४०) के बेटे महमूद शाह शार्की (१४४०-१४५७) ने बेगम गंज में एक बेहद खूबसूरत इमामबाडा बनवाया जिसे इब्राहीम लोधी (1517) ने तुडवा दिया था | आज इस इमामबाड़े को सदर इमामबाडा के नाम से जाना जाता है | ref: IBID pg 22
बीबी राजे जो सुलतान महमूद शार्की की पत्नी थी उन्होंने बेगम गंज में एक बड़ी मस्जिद बनवाई जिसे आज लाल दरवाज़ा के नाम से जाना जाता है और उसका ज़िम्मेदार हमारे जौनपुर में आये पहले जद जनाब सय्यिद अली दाऊद साहब को बना दिया | सय्यिद अली दाऊद की कब्र आज भी मुहम्मद हसन कॉलेज के पीछे च्त्रसारी से पहले सदल्ली पुर (स्य्यिद अली पुर) में मौजूद है |
फिर अकबर का दौर आया जब जौनपुर के गवर्नर मुनीम खान खान इ खाना ने कटघरा मोहल्ला में एक मस्जिद और 'खानकाह ऐ ज़िक्र अन' की तामील करवाई जो आज खंडहर में बदल चुका है | कटघरा मोहल्ला में ऐतिहासिक रौज़ा है जिसमे हजरत मुहम्मद (स.अव), हजरत अब्बास अलमदार , बीबी सकीना के रौज़े बने हुए हैं| किनारे एक पुरानी मस्जिद भी दिखती है को इसके ऐतिहासिक होने का सुबूत देती है | यहाँ पे एक चौक बना हुआ है जिसमे अलम ताज़ा के फूल बहाए जाते हैं और यह पूल गोमती नदी में चला जाता है | ऐसा चौक कहा जाता है की दुनिया में केवल दो हैं एक इरान में और दूसरा कटघरा जौनपुर में |
यह रौज़ा १५२७ में हुमायूँ के ज़माने का बना है लेकिन बार बार यह बाढ़ में नष्ट हो जाता था बाद में १७७४ में खानखाना ने इसे मुकम्मल करवाया |
सय्यिद अहसान अख्विंद मीर जो ईरान के शाह तह्मस्प की फ़ौज में थे हुमायूँ के साथ हिन्दुस्तान आये और जौनपुर में आकर बस गए | उन्होंने बहुत से इमाम बाड़े बनवाये जो आज भी मौजूद हैं और उन्होंने ही इस अज़ादारी में " ज़ुल्जिनाह "निकालने का तरीका शामिल किया जो ईरान में पहले से ही मौजूद था | राजा इदरत जहां जो सय्यिद अहसन अख्विंद मीर की नस्ल से हैं उन्होंने भी मस्जिदों और इमाम बाड़ों की तामील करवायी | REF: ibid PG 50-53
जौनपुर से आठ किलोमीटर की दुरी पे एक क़दीमी इमामबाड़ा इमाम पुर में आज भी मौजूद है |
जौनपुर से आठ किलोमीटर की दुरी पे एक क़दीमी इमामबाड़ा इमाम पुर में आज भी मौजूद है |
जौनपुर शहर से 5 किलोमीटर की दुरी पे स्थित हमजापुर का इमामबाड़ा एक ऐतिहासिक इमाम बाड़ा है | यह शार्की समय का ही बना हुआ है | दिल्ली के बादशाह शाह आलम के दौर में इसकी तामील हुयी और शाह ऐ मुर्तजा साहब जब जियारत करने गए तो वहाँ से कदम ऐ रसूल (स.अ.व) और हजरत अली (अ.स) के दस्त ऐ मुबारक ले आये जिसे इस इमामबाड़े में लगा दिया | यह जो दो छोटी छोटी गुम्बदनुमा इमारत दिख रही हैं इनमे से एम् में हजरत अली (अ.स) का दस्त ऐ मुबारक है और दुसरे में हजरत मुहम्मद (स.अ.व) का कदम के निशाँ मौजूद हैं |
इस इमामबाड़े में दुआएं बहुत जल्द कुबूल हुआ करती है | इसके आस पास के इलाके दखिनपट्टी के लोगों में यहाँ के बारे में बहुत से कहानियां दुआओं के कुबूल होने की मशहूर है |
इसी दौर का एक इमामबाड़ा है शाह का पंजा जिसे पंजे शरीफ भी कहते हैं यह इमामबाड़ा भी मन्नत और मुरादों के लिए बहुत मशहूर है | जहांगीर के दौर में ख्वाजा मीर के बेटे सय्यिद अली जब मदीने गए तो वहाँ से हजरत अली (अ.स) का निशाँ ऐ दस्त और रसूल ऐ खुदा हजरत मुहम्मद (स.अ.व) के क़दमों के निशाँ ले आये | यह १६१३ ईस्वी और १०२१ हिजरी का दौर था | इनको नसब करने के लिए सय्यिद अली साहब ने एक बड़ा हाथा और बुलंद दरवाज़ा बनवाना शुरू किया लेकिन मुकम्मल होने के पहले ही उनका इन्तेकाल हो गया | इसको बाद में चमन बेगम ने मुकम्मल करवाया और पंजे शरीफ के बुलंद दरवाज़े पे लिखवाया |
रौज़ा ऐ शाह ऐ नजफ़ कर्द चमन चू तामीर,......
इसी चमन बेगम की बेटी नवरतन ने रौज़ा ऐ हजरत अब्बास अलमदार पंजे शरीफ को १२९८ हिजरी में बनवाया और उसके दरवाज़े और दालान को रईस जौनपुर जनाब मदद अली खान साहब ने बनवाया |
| Imam bada Meer Ghar |
आज जौनपुर का मरकज़ बेगम गंज का सदर इमामबाडा है जहां आशूर के रोज़ पूरे जौनपुर से दफन होने के लिए ताजिये आते हैं |











