इमामबाड़ा शेख कल्लू मरहूम
इमामबाड़ा शेख कल्लू मरहूम किसने बनवाया ?
ये इमामबाड़ा मोहल्ला शेख मक़दूम शाह में सड़क की दाहिनी तरफ उस सड़क पे है जो पानदरीबा की तरफ जाती है । सय्यद अमजद अली के दामाद फरहत अली खा जब रियासत के मालिक हुए तो उन्होंने जौनपुर में प्रतिष्ठित व्यक्तियों में अपना एक स्थान बनाया और अपने मकान को और अच्छा बनवाया और मोहल्ला शेख मक़दूम शाह में एक इमामबाड़ा बनवाया जो आज कल्लू के इमामबाड़े के नाम से मश्हूर है । यहां पे एक क़दम ऐ रसूल भी मौजूद है ।
शेख कल्लू मरहूम अपने खुद के पैसे से इस इमाबादे में मजलिसें करवाया करते थे और अज़ादारी किया करते थे | सन १८२५ में उनका इन्तेकाल हो गया और लाल बाग में दफन हुए | Ref : जौनपुर नामा , ताजल्लिये नूर भाग २ |
इसका विशालकाय इमामबाड़े का दरवाज़ा बहुत ही खूबसूरत बना है जिसके विशालकाय विशालकाय दरवाज़े पे लिखा है:-
बे अदब पा मनेह इज़ा की अजब हरगाह अस्त
सिज्दागाह ऐ मलक व रौज़ा ऐ शहनशाह अस्त
अनुवाद अनुवाद }- बे अदब यहां पाँव ना रख क्यों की ये रौज़ा एक ऐसे शहंशाह का है जिसे फ़रिश्ते भी सजदा करते हैं ।
शीराज़े हिन्द की अज़ादारी लेखक-डॉ0 सैयद मशीयत हुसैन रिज़वी,जैदपुरी लिखते है की मुग़ल काल के आखिरी दिनों की निशानी के तौर पे कल्लू का इमामबाड़ा मौजूद है जिसे सय्यद जलालुद्दीन तिरमिजी ने बनवाया जो मखदूम शाह अद्धन मोहल्ले में आज भी मौजूद है और अज़ादारी का एक बड़ा मरकज़ बनता जा रहा है |
लेखक एस एम् मासूम
ये इमामबाड़ा मोहल्ला शेख मक़दूम शाह में सड़क की दाहिनी तरफ उस सड़क पे है जो पानदरीबा की तरफ जाती है । सय्यद अमजद अली के दामाद फरहत अली खा जब रियासत के मालिक हुए तो उन्होंने जौनपुर में प्रतिष्ठित व्यक्तियों में अपना एक स्थान बनाया और अपने मकान को और अच्छा बनवाया और मोहल्ला शेख मक़दूम शाह में एक इमामबाड़ा बनवाया जो आज कल्लू के इमामबाड़े के नाम से मश्हूर है । यहां पे एक क़दम ऐ रसूल भी मौजूद है ।
शेख कल्लू मरहूम अपने खुद के पैसे से इस इमाबादे में मजलिसें करवाया करते थे और अज़ादारी किया करते थे | सन १८२५ में उनका इन्तेकाल हो गया और लाल बाग में दफन हुए | Ref : जौनपुर नामा , ताजल्लिये नूर भाग २ |
इसका विशालकाय इमामबाड़े का दरवाज़ा बहुत ही खूबसूरत बना है जिसके विशालकाय विशालकाय दरवाज़े पे लिखा है:-
बे अदब पा मनेह इज़ा की अजब हरगाह अस्त
सिज्दागाह ऐ मलक व रौज़ा ऐ शहनशाह अस्त
अनुवाद अनुवाद }- बे अदब यहां पाँव ना रख क्यों की ये रौज़ा एक ऐसे शहंशाह का है जिसे फ़रिश्ते भी सजदा करते हैं ।
शीराज़े हिन्द की अज़ादारी लेखक-डॉ0 सैयद मशीयत हुसैन रिज़वी,जैदपुरी लिखते है की मुग़ल काल के आखिरी दिनों की निशानी के तौर पे कल्लू का इमामबाड़ा मौजूद है जिसे सय्यद जलालुद्दीन तिरमिजी ने बनवाया जो मखदूम शाह अद्धन मोहल्ले में आज भी मौजूद है और अज़ादारी का एक बड़ा मरकज़ बनता जा रहा है |
लेखक एस एम् मासूम





