वहाब बिन अब्दुल्ला क़ल्बी
ये वहाब की कर्बला में शहादत का वाक़या है जिसकी शादी को सिर्फ दो महीने ही हुए थे और जो अपनी बेवा माँ का अकेला बेटा था । वहाब बिन अब्दुल्ला क़ल्बीकी माँ ने हज पे जाने का फ़ासिला किया और अपने बेटे और बहू के ले के जब वो कूफा छोड़ने लगी तो उसने देखा की कूफा के चारों ओर सख्त पहरे लगे हैं । उसने जब इसकी वजह पूछी तो पता चला की कर्बला में कुछ बागी हैं और उनसे कूफा को खतरा है । यह पता करने पे की यह बागी कौन हैं लोगों ने बताया हुसैन इब्ने अली । बस इतना सून्नना था की वो बेहोश हो गयी और जब होश आया तो बेटे से बोली ऐ बेटा तेरा बाप अब्दुल्ला क़ल्बी हज़रत अली (अ स ) का चाहने वाला था और मौला अली की दुआओं से दुनिया में आया है ।
सबने मिल के फैसला किया की वो सभी कर्बला इमाम हुसैन से मिलने जाएंगे । जब सब कर्बला पहुंचे और इमाम हुसैन के हालात मालूम हुए तो वहाब ने फैसला लिया की वो इमाम हुसैन की तरफ से कर्बला में अपनी शहादत पेश करेगा ।इतना सुन ना था की वहाब की माँ ने कहा वो दुनिया की सबसे खुशकिस्मत माँ है की उसका बेटा नवासा ऐ रसूल हुसैन इब्ने अबी तालिब पे शहीद होने जा रहा है ।
वहाब जंग में बहादुरी से लड़ा और अपनी क़ुरबानी को पेश किया । जब वहाब जंग लड़ रहा था तो उसकी माँ और बीवी फक्र से उसकी जंग देख रही थी और अल्लाह का शुक्र अदा कर रही थी । वहाब को शहीद करने के बाद इब्ने ज़्याद ने उसका सर काट के उसकी माँ की तरफ फेंक दिया लेकिन वहाब की माँ ने बेटे के बोस दिया और वापस इब्ने ज़्याद को लौटा दिया यह कहते हुए की अल्लाह की राह में जो दे दिया उसे हम वापस नहीं लेते ।
वहाब की माँ अपनी बहू को पुरसा देने में जनाब ऐ ज़ैनब आयीं और दोनों को गले लगाया और कहा अल्लाह तुम्हे सब्र दे और तुम्हारी क़ुरबानी को क़ुबूल करे ।


