मदीने से चला काफिला कर्बला में कैसे लुटा ? जॉन बिन हुवेई
कर्बला में जो लोग शहीद हुए हैं उनमे से १६ आज़ाद किये गए गुलाम भी थे जो ज़्यादातर आज के एथिपिया इलाक़े के थे । शब ऐ आशूर इमाम हुसैन ने सभी गुलामो को आज़ाद कर दिया और चाहें तो जान बचा के जा सकते हैं । जॉन बिन हुवेई भी उन्ही गुलामो में से एक थे जिन्होंने यह कह के जाने से इंकार कर दिया की जब आपके अच्छे दिन थे तब तो आप के साथ रहा और अब जब मुश्किल वक़्त आया तो मैं चला जाऊं ? ये मुझसे ना होगा और वो इमाम के साथ ही रहा ।
जॉन बिन हुवेई हज़रत अली अस का गुलाम था जिसे उन्हने अपने सहाबी अबूज़र को दे दिया था । जब अबूज़र ने मदीना छोड़ा तो जॉन बिन हुवेई वापस हज़रत के पास आ गया और हज़रत अली की शहादत के बाद से इमाम हुसैन के पास आ गया ।
शब ऐ आशूर जॉन बिन हुवेई रात भर अपनी तलवार के तेज़ करता रहा और दिन में यज़ीदी फ़ौज के दो हमलो को नाकाम करने में कामयाब भी रहा । जब असर का वक़्त आया तो वो इमाम हुसैन के पास जा के चुप चाप खड़ा हो गया । इमाम ने कहाँ ऐ जॉन बिन हुवेई मुझे पता है की तुम मैदान ऐ जंग में जाने की इजाज़त लेने के लिए आये हो इमाम ने उस से अकहा जाओ चले जाओ तुम आज़ाद हो लेकिन जॉन बिन हुवेई ने कहा मौला क्या मुझे इस लिए इजाज़त नहीं मिल रही की मैं काला हूँ और मेरे जिस्म से खुशबू नहीं आती ?
इमाम ने जॉन बिन हुवेई को इजाज़त दी और उसने मैदान ऐ जंग में जा के अपनी शहादत पेश की । कहते हैं की जॉन बिन हुवेई अकेले शहीद थे जिनका रंग इमाम की दुआ से सफ़ेद हो गया था और जिस्म से एक अलग ही खुशबू आ रही थी ।


