ज़ुहर कैन और सईद इब्ने अब्दुल्लाह
ज़ुहर कैन और सईद इब्ने अब्दुल्लाह
क़ुरआन में और अहादीस में नमाज़ की अहमियत का ज़िक्र बार बार हुआ है । कर्बला में दौरान ऐ जंग ज़ुहर की नमाज़ इमाम हुसैन ( अ स ) की तरफ कैसी अदा की गयी यह भी अपने आपमें एक मिसाल है । जब आशूरा के रोज़ वक़्त ऐ नमाज़ ऐ ज़ुहर आया तो हुसैन के लश्कर में ज़्यादातर असहाब शहादत पा चुके थे और सिर्फ १५ असहाब और १८ बनी हाशिम के लोग बचे थे । इन ३३ लोगों ने इमाम हुसैन (अ स ) के पीछे मैदान ऐ जंग में पढ़ने के लिए खड़े हुए और इमाम हुसैन अ स सबसे आगे खड़े हो गए ।
दुश्मन यज़ीदियों ने इमाम के ऊपर तीर बरसाने शुरू कर दिए जिस जिससे इमाम के लिए नमाज़ पढ़ाना मुश्किल होता जा रहा था । तभी इमाम ने ऐलान किया की आज की नमाज़ "नमाज़ ऐ ख़ौफ़ " की नमाज़ होगी । जिसमे आधे नमाज़ शुरू करेंगे और आधे उस नमाज़ में बाद में शामिल होंगे जिस से सभी को नमाज़ इमाम के पीछे पढ़ने का मौक़ा मिल जाय । अब मसला यह आया की इमाम हुसैन को तीरों से कौन बचाएगा ? उसके लिए ज़ुहर कैन और सईद इब्ने अब्दुल्लाह सामने आये और इमाम से इजाज़त मांगी की उन्हें सामने से तीरों को रोकने दिया जाय जिसे इमाम हुसैन ने मान लिया । इन दोनों ने पहले अपनी नमाज़ पूरी की और फिर इमाम के सामने आके तीरों को रोकते रहे और इमाम नमाज़ पढ़ाते रहे । तीर जब भी आये दोनों ने आगे बढ़ के रोक या अपने जिस्म को इमाम के आगे कर दिया लेकिन एक भी तीर इमाम को लगने नहीं दिया और जब नमाज़ पूरी हुयी तो ज़ुहैर के जिस्म में ३३ और सईद के जिस्म में ५२ लगे थे और जैसे ही इमाम ने नमाज़ ख़त्म की दोनों वही गश खा के गिर पड़े और शहीद हुए ।
इमाम हुसैन ने हाथ उठा के दुआ की ऐ ज़ुहर कैन ऐ सईद इब्ने अब्दुल्लाह तुमने अल्लाह की उस इबादत को बचाने के लिए अपनी जान दी जो अल्लाह को सबसे ज़्यादा पसंद है और अल्लाह नमाज़ के लिए जान देने वालों पे रहम सभी लोगों ने आमीन कहा ।


