इमाम की इताअत ,भाई से वफ़ा और सब्र की पहचान हैं अब्बास अलमदार | एस एम् मासूम : हज़रत अब्बास अलमदार मुसलमानो के खलीफा हज़रत अली अलैहिसलाम ...
इमाम की इताअत ,भाई से वफ़ा और सब्र की पहचान हैं अब्बास अलमदार |
एस एम् मासूम : हज़रत अब्बास अलमदार मुसलमानो के खलीफा हज़रत अली अलैहिसलाम और उम्मुल बनीन के बेटे थे जिनकी
विलादत ४ शाबान को हुयी और अली (अ स) ने ख़ास तौर पे उनको अल्लाह से हुसैन के लिए ही माँगा था । हज़रत अब्बास की माँ फातिमा बिन्ते हज्जाम के चार बेटे थे इसलिए उन्हें उम्मुल बनीन कहा गया | उम्मुल बनीन ने हमेशा अपने और फातिमा बिन्ते मुहम्मद के बेटों में कोई फ़र्क़ नहीं किया।जब अब्बास पैदा हुए तो अली ने हुसैन को बुलाया और उनकी गोद में अब्बास को दे दिया और कहा इसके कान में अज़ान और अक़ामत कहो । जैसे ही अब्बास गोदी में आये तो मुस्कराने लगे और अपनी बाहें फैलाने लगे जैसे कह रहे हो भैया हुसैन आक़ा यही हाथ मैं आप पे क़ुर्बान करूँगा ।
जब इमाम हुसैन ने फैसला किया था मदीने को छोड़ने का तो उम्मुल बनीं अपने चारो बेटों को लेके इमाम हुसैन के पास आयीं और उनको साथ ले जाने को कहा । इतना ही नहीं अपने बेटों से कहा देखो अगर मैंने सूना की तुममे से कोई ज़िंदा रहा और हुसैन या ज़ैनब पे कोई आंच आ गयी तो मैं दूध न बक्शूंगी । अपनी वीरता, अदम्य साहस, सुन्दरता, निष्ठा, त्याग और मर्यादापूर्ण व्यवहार के कारण हज़रत अब्बास को “क़मरे बनी हाशिम” की उपाधि दी गई थी जिसका अर्थ होता है बनी हाशिम परिवार का चन्द्रमा। हज़रत अब्बास को “क़मरे बनी हाशिम” के नाम से इसलिए पुकारा जाता था क्योंकि उनका सुन्दर मुख, चन्द्रमा की भांति दमकता रहता था।

हज़रत “अबुलफ़ज़्ल” ने जीवन के आरंभिक १४ वर्ष अपने प्रिय पिता हज़रत अली अलैहिस्सलाम के साथ व्यतीत किये। इतिहास इस बात का साक्षी है कि हज़रत अली अलैहिस्सलाम अपनी संतान के प्रशिक्षण पर विशेष ध्यान दिया करते थे। हज़रत अब्बास ने अपने पिता हज़रत अली अलैहिस्सलाम की बुद्धिमानी, निष्ठा और परिपूर्णता एवं प्रवीणता से बहुत लाभ उठाया था। “अबुलफ़ज़्ल” के जीवन पर उनके पिता की गहरी छाप पड़ी थी। हज़रत अब्बास, करबला में इमाम हुसैन की सेना के अलमदार (सेनापति ) थे। करबला के रणक्षेत्र में उन्होंने अपनी निष्ठा और वफ़ादारी का प्रदर्शन किया।
कर्बला में जब पैगम्बर हजरत मुहम्म्द स० के नाती इमाम हुसैन और हज़रत अब्बास अलमदार को उनके परिवार और साथियों के साथ यज़ीद की फ़ौज ने घेर लिया और उनको मजबूर किया की कर्बला में खेमे लगा दें तो खेमे दरया फुरात के किनारे लगा दिए गए और बात चीत का दौर शुरू हुआ |
इमाम की इताअत की मिसाल थे अब्बास अलमदार |
पांचवीं मुहर्रम को यज़ीदी फ़ौज की तरफ से यह फरमान आया की खेमे दरया किनारे से हटा लिए जाएँ और दूर कहीं लगाय जाएँ तो हज़रत अब्बास अलमदार को गुस्सा आया और खेमे के चारों तरफ घोड़े पे बैठ के हिसार करने लगे की है किसी में हिम्मत तो खेमे हटा के दिखाओ | अब्बास अलमदार इतने बहादुर थे की दुश्मन की फ़ौज में अफरा तफरी मच गयी और जंग के आसार नज़र आने लगे जो इमाम हुसैन नहीं चाहते थे बल्कि उनका सोंचना था की बात चीत से मसला हल हो जाय खून किसी का बहे |
तब इमाम हुसैन आगे आये और हज़रत अब्बास के कंधे पे हाथ रखा बस इमाम हुसैन का हाथ रखना था की समझ गए अब्बास की हुक्म ऐ इमाम है की खेमे हटा लिए जाएँ | अब्बास जानते थे उनके बाज़ुओं में इतनी ताक़त है की दुश्मन खेमानहीं हटा सकता था लेकिन हुक्म ऐ इमाम था ना चाहते हुए भी खेमे हटाने लगे लेकिन आँखों में आंसूं थे | सब्र तो कर लिया लेकिन जानते थे आने वाले दिन बिना पानी के बहुत सख्त गुज़रेंगे | वहीँ इमाम हुसैन को प्यास मंज़ूर थी ले खून बहाना मंज़ूर नहीं था | खेमे हटा दिए गए और साथ मुहर्रम से पानी ख़त्म हो गया बच्चे प्यास से तड़पने लगे |
यज़ीदी लश्कर परेशान था क्यों की जानता था हज़रत अब्बास अलमदार के रहते वो इमाम हुसैन का क़त्ल नहीं कर सकेंगे और न ही उन्हें बैयत के लिए मजबूर कर सकेंगे | ९ मुहर्रम का ज़ुहर का वक़्त था की दुश्मन की फ़ौज की तरफ से एक लश्कर आता दिखाई दिया | लोगों ने देखा यज़ीदी लश्कर का सरदार शिमर आया है और कह रहा है उसे अब्बास से बात करनी है | शिमर ने पहले भी अब्बास अलमदार को हुसैन से अलग करने की कोशिश की थी इसलिए अब्बास कहा किसी भी दूसरे को भेज दिया जाय शिमर से बात करने लेकिन इमाम हुसैन ने कहा नहीं अब्बास तुम जाओ देखो तो सही क्या कहता है | इमाम का हुकम था अब्बास ने सर झुका लिया और शिर्म के पास बात करने गए | शिमर ने कहा अब्बास तुम्हारे लिए अमान नामा लाया हूँ तुम्हारी माँ उम्मुल बनींन के क़बीले का रिश्ता हमारे क़बीले से रहा है इसलिए तुम तुम्हारे चारों भाई और बेटे अगर यहां से चाहो तो जा सकते हो तुम्हे कोई नहीं नुकसान पहुंचाएगा | इतना सुन्ना था की अब्बास ने पुछा और मेरे भाई मेरे इमाम हुसैन के लिए ? शिर्म ने कहा नहीं वो जब तक बैयत नहीं करते यज़ीद के हाथों उनके लिए क़त्ल का हुक्म रहेगा |
कोई और होता तो ऐसे में अपनी जान बचा लेता क्यों की यह तय था की अब कल शहादत होगी सबकी | लेकिन हज़रत अब्बास की वफ़ा की इंतेहा देखिये की शिर्म से कहा अगर हुसैन के लिए अमान नामा नहीं तो मुझे तेरी कोई शर्त मंज़ूर नहीं | इस वफ़ा का नाम अब्बास है | आज भी देखिये होता है ना की जब कोई आपसे दुश्मनी करता है तो आपको कमज़ोर करने के लिए आपके भाई , रिश्तेदारों , दोस्तों पे बड़ा मेहरबान होने लगता है जिससे आप का साथ वो छोड़ दे या ना दे चुप रहे और आप तनहा और कमज़ोर हो जाएँ | और होता भी ज़्यादातर यही है की जिसपे दुश्मन मेहरबान होता है वो अपने को किनारे कर लेता है और अपने ही भाई , रिश्तेदार , दोस्तों के दुश्मन से अच्छे ताल्लुक़ात बनाते हुए इस मामले से खुद को न्यूट्रल करते हुए हटा लेता है |
लेकिन यह अब्बास है जिसने भाई और इमाम हुसैन से वफ़ा की और हमें पैगाम ताकयामत तक के लिए दिया कि दुश्मन की साज़िश को पहचानो और अपने दोस्तों का भाई का साथ न छोड़ना | लालच में आके हक़ का साथ नहीं छोड़ना चाहिए |
दस मुहर्रम को जब यह तय हो गया दुशमन की तरफ से की जंग होनी ही है तो अब्बास अलमदार सबसे पहले गए इमाम हुसैन के पास क्यों की उन्हें इसी सुबह का इंतज़ार था और बोले मौला मुझे इजाज़त दें दुशमन कितना भी मज़बूत हो मुझे यह जंग फतह करने में वक़्त नहीं लगेगा | इमाम हुसैन ने अपने लश्कर का अलम अब्बास के हाथ में दिया और कहा नहीं अब्बास तुम इस लश्कर के अलमदार हो तुम्हे मेरा साथ आखिर तक देना है | अब्बास समझ गए इजाज़त नहीं और अब्बास ने सब्र किया | जब भी कोई शहीद होता अब्बास इमाम हुसैन के पास जाते जंग की इजाज़त लेने लेकिन नहीं मिलती | एक वक़्त आया कि सभी शहीद हो गए बस इमाम रहे और अब्बास अलमदार और खेमे में औरतें बच्चे जिनके मुँह से बस एक आवाज़ आ रही थी है हाय प्यास हाय प्यास |
इमाम हुसैन की बेटी अब्बास की भतीजी सकीना ने कहा चचा प्यास मारे डाल रही है | इमाम हुसैन को मौक़ा मिल गया और बोले अब्बास ठीक है जाओ जंग पे लेकिन पहले दरया से थोड़ा पानी इस मश्क़ में बच्चों के लिए ला दो | अब्बास खुश हो गए और मश्क़ को ले के दरया किनारे फ़ौज को चीरते हुए पहुंचे और पानी भरा ,किसी की हिम्मत नहीं पडी की अब्बास को दरया से पानी लेने से रोक लेता | अब्बास लौटे आगे मश्क़ पानी से भरी रखी और खेमे की तरफ तेज़ तफ्तार से चले | दुश्मन पीछे से घेरने लगा और एक वक़्त आया की अब्बास को लगा कहीं मश्क़ पे तीर ना लग जाय बस मश्क़ बचाने की फ़िक्र में रफ़्तार और तेज़ की थी कि अचनाक एक शख्स ने तलवार से हमला किया पीछे से पेड़ों के पीछे चुप के और अब्बास का एक बाज़ू क़लम हो गया | फिर तीरों की बारिश हुयी अब्बास ने मश्क़ को संभाला की दुश्मन ने दूसरा बाज़ू थी क़लम कर दिया | मश्क़ को दातों से दबाया की एक तीर मश्क़ पे लगा और पानी बह गया| है अब्बास मायूस हो गए और घोड़े को घुमा दिया खेमे से दूर की अब भतीजी को क्या मुँह दिखाऊंगा की बिना पानी के आ गया |
अब्बास पे तलवारे तीर नैज़े चलने लगे अब्बास संभल ना सके घोड़े से गिरे सर के बल क्यों की अब्बास के हाथ दोनों क़लम हो चुके थे और अब्बास ने आवाज़ दी मौला को आखिरी सलाम |
आज हज़रत अब्बास की याद में अज़ादार उनको चाहने वाले अलम निकालते हैं जिसपे जनाब ऐ सकीना की मश्क़ लगी रहती है | यहाँ अलम अब्बास की वफ़ा , इमाम हुसैन की इताअत , सब्र और सकीना की प्यास की निशानी है |
सलाम हो अली के सुपुत्र अबल फ़ज़्लिल अब्बास पर जिन्होंने सत्य के ध्वज को ऊंचा रखने के मार्ग में अपने प्राण की आहूति दी और इतिहास में अमर हो गए।
लेखक एस एम् मासूम


