कर्बला में ६ महीने के बच्चे को भी प्यासा शहीद किया कर्बला में जब पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (स) के नाती इमाम हुसैन को उनके साथियों और परिवार के ...
कर्बला में ६ महीने के बच्चे को भी प्यासा शहीद किया
कर्बला में इमाम हुसैन के साथ उनकी पत्नी उनके बच्चे भी थे जिनमे एक बच्चा तो अभी केवल 6 महीने का अपनी माँ रुबाब की गोद में था | पांच मुहर्रम को इमाम हुसैन के खेमे दरया किनारे से हटा दिए जिस से उन्हें पानी न मिल सके और सात मुहर्रम आते आते खेमे में पानी ख़त्म हो गया | सभी प्यासे परेशान अल अतश की सदायें बलन्द है हाए प्यास मारे डाल रही है की आवाज़ें आने लगी | बड़ों ने तो सहन किया लेकिन बच्चे हाए प्यास की सदायें बलन्द करते थे जिसकी आवाज़ पूरी रात सुनसान रेगिस्तान में गूंजने लगी लेकिन यज़ीद की फ़ौज को तरस नहीं आया | | १० मुहर्रम आशूरा के दिन एक एक करके इमाम हुसैन के सभी साथी मैदान ऐ कर्बला में शहीद कर दिए गए और इमाम हुसैन अकेले रह गए |
इमाम हुसैन से बच्चों की प्यास सहन ना हुआ सोंचा इस यज़ीदी फ़ौज को उनसे दुश्मनी है उनसे बैयत चाहिए चलो अपने ६ महीने के बच्चे अली असगर के लिए पानी मांगता हूँ उसे तो पानी मिल जायगा और मुमकिन है सभी बच्चे पानी पी सकें |
इमाम हुसैन ने अपने ६ महीने के बच्चे को झूले से उठाया उसकी मां रुबाब ने उसे अच्छे कपडे पहनाय और इमाम हुसैन उसे गोद में ले के मैदान ऐ जंग में दुश्मन के लश्कर के सामने गए और कहा ऐ लोगों मेरा ६ महीने का बच्चा प्यास से मरने वाला है मुझे पानी न दो लेकिन कम से कम इस मासूम से बच्चे को तो पानी पीला दो | कोई नहीं आया आगे पानी पिलाने |
इमाम हुसैन ने फिर कहा देखो अगर तुम्हे लगता है की मैं इस बच्चे के बहाने पानी पी लूंगा तो इसे मैं जलती रेत पे लिटा देता हूँ इसे पानी पीला दो और कह के हुसैन ने अपने मासूम से बच्चे अली असग़र को जलती रेत पे लिटा दिया लेकिन कोई पानी ले के ना आया | लेकिन दुश्मन के लश्कर में लोग रोने लगे और इस से पहले की दुश्मन के लश्कर में बग़ावत हो जाती उनके सरदार उमर साद ने सबसे मशहूर तीरंदाज़ हुरमुला को हुक्म दिया बच्चे पे तीर चलाओ | बस इतना सुनना था की इमाम हुसैन ने अपने बच्चे अली असग़र को गोद में उठाया | इतनी ही देर में दुश्मन के लश्कर से हुरमुला ने वो तीर चला दिया जो जंगली जानवरो को मारने के लिए इस्तेमाल होता है जो नन्हे बच्चे अली असग़र की गर्दन में लगा और गर्दन जिस्म से बाप हुसैन की गोद में अलग हो गयी और बच्चे की माँ खेमे के दरवाज़े से देखती रही | इमाम हुसैन बच्चे को गोद में लिए खेमे की तरफ चले लेकिन हिम्मत न पड़ी की कैसे इसकी माँ के सामने जाएँ | किताबों में मिलता है की इमाम हुसैन सात बार खेमे की तरफ आगे बढे और वापस लौट आये और जब हिम्मत न पडी तो वही रेत पे अपने प्यासे मासूम से बच्चे अली असग़र को दफन कर दिया | मासूम अली असग़र की शहादत ने बता दिया मामला बैय्यत का केवल नहीं था बल्कि| पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद (स) और उनके दामाद मुसलमानो के खलीफा हज़रत अली से दुश्मनी का था |

इमाम हुसैन के चाहने वाले जुलुस अज़ादारी में आज भी अली असग़र का खाली झूला लिए मातम करते और आंसू बहाते हैं | इस ज़ुल्म की दास्ताँ सुनके हर इंसान रोता है |


